भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०५ उभयोदय है । एक अन्य बात इन राशियों के विषय में अन्यत्र कही गयी है वह भी यहाँ बताते हैं । पृष्ठोदय राशि में क्रूर ग्रह हो तो अत्यन्त अशुभ और शुभ ग्रह हो तो कम अशुभ । शीर्षोदय राशि में शुभ-ग्रह हो तो पूर्ण शुभ, क्रूर-ग्रह हो तो कम अशुभ । उभयोदय में मिश्रत फल ॥ ३३ ॥ यद्भावगो गोचरतो विलग्नात्- दशेश्वरः स्वोच्चसुहृद्गृहस्थः । तद्भावपुष्टिं कुरुते तदानीं बलान्वितश्चेज्जननेऽपि तस्य ॥३४॥ यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह महादशा के समय, लग्न से किस भाव में जा रहा है । इस श्लोक में यह नयी बात बतायी गयी है कि एक ही महादशानाथ--जब उसकी महादशा जा रही हो--तब गोचरवश भिन्न-भिन्न स्थानों में रहता हुआ भिन्न- भिन्न फल करता है । महादशा स्वामी यदि जन्म कुण्डली में भी बलवान् हो तो जब उसकी महादशा के समय गोचरवश अपनी उच्च । स्वराशि, या मित्र राशि में रहता हुआ लग्न से जिस भाव में भ्रमण करता है उस भाव का पुष्टिकारक होता है । मान लीजिये किसी की कुण्डली में राहु बड़ा बलवान् है । और राहु की महादशा है तो जब गोचरवश जन्म लग्न से ११वें आवेगा तब धन लाभ करावेगा, जब जन्म लग्न से दशम में आवेगा तब पदोन्नति कारक होगा । जब नवम में आवेगा तब भाग्योदय करेगा--इस प्रकार महादशानाथ के गोचरवश, फल में तारतम्य कर विचार करना चाहिये ॥ ३४ ॥