फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०३ ग्रह नीच राशि में हो तो शुभफल शून्य के बराबर होता है । यदि पाप ग्रह नीच राशि में हो तो पापफल पूर्ण अर्थात् सोलह आना अशुभ होता है । यदि अशुभ ग्रह शत्रु राशि में हो तो बारह आना अशुभ फल; यदि पाप-ग्रह मित्र राशि में हो तो आठ आना अशुभ फल । यदि पाप ग्रह स्वराशि में हो तो चार आना अशुभफल । यदि पाप- ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में हो तो दो आना अशुभ फल और यदि उच्च राशि में हो तो पाप फल शून्य के बराबर अर्थात् बहुत कम होता है । यदि ग्रह अस्त हो तो नीच राशि स्थित ग्रह के समान फल करता है ॥ ३० ॥ मन्दमान्द्यगुखरेशरण्ध्रपाः- तन्नवांशपतयोऽपि ये ग्रहाः । तेषु दुर्बलदशा मृतिप्रदा कष्टभे चरति सूर्यनन्दने ॥३१॥ यह देखिये कि निम्नलिखित में सबसे दुर्बल कौन है (क) शनि (ख) मान्दि (ग) राहु (घ) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (ङ) अष्टमेश और (च) अ से (ङ) तक जो बताये गये हैं वे जिन नवांशों में हैं उन नवांशों के स्वामी । उपर्युक्त में जो सबसे दुर्बल होता है उसकी दशा मृत्यु कारक होती है और मृत्यु तब होती है जब शनि भी गोचरवश अनिष्ट हों ॥ ३१॥ मृतीशनाथस्थितभांशकेशयोः खरत्रिभागेश्वरयोर्बलीयसः । दशागमे मृत्यूपयुक्तभांशक- त्रिकोणगे देवगुरौ तनुक्षयः ॥३२॥