भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

४०२ फलदीपिका यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा चल रही है वह कहाँ है और जिस ग्रह की अन्तर्दशा चल रही है वह कहाँ है । यदि महादशा के स्वामी से गिनने पर अन्तर्दशा का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें हो तो कष्टकारक होता है । यदि अन्तर्दशा नाथ (महादशा- नाथ से) गिनने पर ६, ८, १२, के अलावा अन्य स्थानों में हो तो अच्छा है । इस श्लोक में यह नयी बात बतायी कि महादशा और अन्तर्दशा का विचार करते समय केवल दोनों ग्रहों का ही अलग २ विचार नहीं कर लेना चाहिये बल्कि यह भी देखना चाहिये कि अन्तर्दशा- नाथ— महादशानाथ से ६, ८, १२ तो नहीं है ॥ २९ ॥ महादशानाथ जिस घर में बैठा है उससे गिनने पर अन्तर्दशा- नाथ जिस घर में बैठा है—उसका फल करेगा—अर्थात् यदि अन्तर्दशानाथ —महादशानाथ से नवम में है तो भाग्य वृद्धि करेगा, दशम में बैठा है तो पद वृद्धि, एकादश में बैठा है तो लाभ । सिद्धान्त यह हुआ कि केवल अन्तर्दशानाथ की स्थिति का विचार लग्न से, या चन्द्र लग्न से ही नहीं करना बल्कि महादशानाथ जिस राशि में बैठा है—उससे भी करना चाहिये । स्वोच्चत्रिकोणस्वहितारिनीचे पूर्णं त्रिपादार्द्धपदालपशून्यम् । क्रमाच्छुभं चेदशुभं विलोमात् मूढे ग्रहे नीचसमं फलं स्यात् ॥३०॥ [L2