फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०१ दिखाते हैं । अमोघ कहते हैं ऐसे कष्ट को जो निश्चय ही होता है और जिससे छुटकारा पाना सम्भव न हो ॥ २७ ॥ अब तक महादशा, अन्तर्दशा का फल बता रहे थे । अब बीच में अन्तर्दशा का फल बताने वाला एक श्लोक कहते हैं । दशेशशत्रोररिगेहभाजो लग्नेशशत्रोरपि वाऽथ भुक्तौ । शत्रोर्भयं स्थानलयः तदास्य स्निग्धोपि शत्रुत्वमुपैति नूनम् ॥२८॥ यदि ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा हो जो ( १ ) जिस ग्रह की महादशा चल रही है उसका शत्रु हो । ( २ ) या शत्रु-राशि में हो ( ३ ) या छठे हो ( ४ ) या लग्नेश का शत्रु हो, तो ऐसी अन्तर्दशा में शत्रु का भय हो, स्थान भय हो । ( नौकरी या मकान छूटे । ) यह अन्तर्दशा बहुत कष्टकारक बीतती है और जातक के मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।* ॥ २८ ॥ यद्भावगः पाकपतिर्दशेशात्- तद्भावजातानि फलानि कुर्यात् । विपक्षरिफाष्टमभावगश्चेद्- दुःखं विदध्यादितरत्र सौख्यम् ॥२९॥ *मूल श्लोक में शब्द आया है 'अरिगेहभाजो' जिसको दो अर्थ हो सकते हैं । ( १ ) शत्रु के घर में हो ( २ ) शत्रु का विचार छठे घर से किया जाता है इसलिये लग्न से छठे घर में हो । ऊपर श्लोक का भावार्थ समझाते हुए यह दोनों अर्थ दे दिये गये गये हैं । यह भी विचार कर लेना चाहिये कि अन्तर्दशा नाथ महादशा स्वामी की शत्रु-राशि में तो नहीं है ।