भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 684 में से

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४०० फलदीपिका स्वर्ण आदि से सम्पन्न, लोक में प्रशंसित होकर भोग करता है । यह शुक्र महादशा का फल है । * अब ऐसे ग्रहों की महादशा का फल बताते हैं जो नीच राशि में छठे या आठवें हों । प्रायः यह समझा जाता है कि शुभ-ग्रह कहीं भी बैठे अच्छा । तो क्या छठे या बारहवें में बैठा हुआ शुभ ग्रह शुभ फल दिखावेगा ? एक ज्योतिष की कहावत है कि : “पापाः षष्ठे वित्तलाभं प्रकुर्युः” तो क्या पाप-ग्रह छठे में अच्छा फल दिखावेंगे ? इन्हीं शंकाओं का जवाब नीचे के श्लोक में दिया जा रहा है । नीचारिषष्ठव्ययसंश्रिता हि शुभाः प्रयच्छन्त्यशुभानि सर्वे । शुभेतरास्त्वेषु गताः प्रयच्छ- न्त्यमोघदुःखानि दशासु तेषाम् ॥२७॥ यदि शुभ-ग्रह नीच-राशि में, शत्रु-राशि में, छठे या बारहवें बैठे हों तो यह सब अशुभ फल दिखाते हैं—और यदि जो शुभ नहीं है अर्थात् पाप-ग्रह अपनी नीच राशि में, शत्रु-राशि में छठे या बारहवें बैठे हों तो वे क्या फल दिखावेंगे ? वे अपनी दशा में अमोघ दुःख

  • मूल में “स्वोच्चस्थित” यह शब्द आया है—स्वराशि या उच्च राशि यह अर्थ लेने से शुक्र यदि वृष, तुला, मीन किसी में हो तो उपर्युक्त फल करेगा। किन्तु यदि स्त्रोच्च का यह अर्थ लिया जावे कि अपनी उच्च राशि में, तो उपर्युक्त योग केवल तभी बनेगा जब शुक्र मीन का हो । हम दूसरे अर्थ के पक्ष में हैं । और ग्रह बारहवें घर में अच्छे नहीं माने जाते, किन्तु भोग प्रदाता शुक्र द्वादश में बहुत भोग कराता है ।