फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९९ ऊर्ध्वास्यतुङ्गभवनस्थितभूमिजस्य कर्मायगस्य हि दशा विदधाति राज्यम् । जित्वा रिपून्विपुलवाहनसैन्ययुक्तां राज्यश्रियं वितनुतेऽधिकमन्नदानम् ॥२५॥ यदि मंगल ऊर्ध्वमुख राशि में स्थित होकर मकर में हो और लग्न से दशम या एकादश स्थान में स्थित हो तो राज्य प्रदान करती है। ऐसा जातक शत्रुओं को जीत कर बहुत बड़ी सेना का अधिपति हो राज्यलक्ष्मी का उपभोग करता है और उसके आश्रय में अनेक लोग पेट पालते हैं । यह जो विशिष्ट राजयोग बताया गया है इसमें तीनो बात होना आवश्यक है; (१) मंगल उच्च राशि में हो (२) दशम या एकादश में हो (३) ऊर्ध्वमुख राशि में हो । ऊर्ध्वमुख राशि किसे कहते हैं यह पहले अध्याय के आठवें श्लोक में बताया गया है ।* ॥ २५ ॥ स्वोच्चस्थितो भृगुसुतो व्ययकर्मगो वा लाभेऽपि वाऽस्तरहितो न च पापयुक्तः । तस्याब्दपाकसमये बहुरत्नपूर्णो धीमान्विशालविभवो जयति प्रशस्तः ॥२६॥ अब शुक्र सम्बन्धी एक विशिष्ट राजयोग बताते हैं। यदि मीन, तुला या वृषभ राशि का शुक्र दशम या द्वादश में स्थित हो या एकादश में ही हो किन्तु किसी पाप ग्रह के साथ न हो और अस्त न हो तो उस शुक्र की महादशा में जातक बहुत धनी, वैभव युक्त, *यह मंगल की महादशा का फल है ।