भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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३९८ फलदीपिका भरणी—भरणी तृतीय नक्षत्र हुआ; रोहिणी पंचम नक्षत्र हुआ; आर्द्रा सप्तम नक्षत्र हुआ । भरणी का स्वामी शुक्र है, रोहिणी का चन्द्रमा, आर्द्रा का राहु । ऐसी स्थिति में किसी क्रूर ग्रह की दशा हो— मान लीजिये शनि की महादशा हो तो उसमें शुक्र, चन्द्र और राहु की अन्तर्दशा कष्टमय जावेगी । इसी प्रकार क्रूर ग्रह की दशा हो और उसमें जन्मराशि के स्वामी की अन्तर्दशा हो या जन्म राशि से अष्टम राशि के स्वामी की दशा हो तो चोर-पीड़ा, शत्रु-पीड़ा और दुःख आदि कष्ट होते हैं ॥ २३ ॥ शनेश्चतुर्थी च गुरोस्तु षष्ठी दशा कुजाह्वोर्यदि पञ्चमी सा । कष्टा भवेद्राश्यवसानभाग- स्थितस्य दुःस्थानपतेस्तथैव ॥२४॥ निम्नलिखित दशायें कष्टकारक होती हैं । (१) शनि की दशा यदि चौथी हो । (२) बृहस्पति की दशा यदि छठी हो (३) मंगल और राहु की दशा यदि पाँचवी हों । (४) किसी राशि के अन्तिम अंश पर स्थित यदि कोई ग्रह हो अर्थात् यदि कोई ग्रह किसी भी राशि में ३०वें अंश पर हो । (५) दुःस्थान अर्थात् ६, ८, १२ के मालिक की दशा। यदि किसी का जन्म मंगल की महादशा में हो तो भौ. रा. जी. श—शनि की दशा उसे चौथी होगी । यदि किसी का जन्म शुक्र की महादशा में हो तो राहु की दशा पंचम होगी और गुरु की दशा षष्ठ होगी । इसी प्रकार यदि किसी का जन्म केतुकी महादशा में हो तो मंगल की दशा उसे पंचम होगी ॥ २४ ॥