भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९७ वर्गोत्तमांशस्थदशा शुभप्रदा मिश्रेव सा चास्तमिते च नीचगे । मृत्युव्ययारीशदशापहारयो- स्तत्र स्थितस्याप्यशुभं फलं भवेत् ॥२२॥ यदि कोई ग्रह वर्गोत्तम में हो तो वह बहुत शुभ फल देता है। किन्तु यदि वर्गोत्तम में होते हुए भी वह ग्रह अपनी नीच राशि में हो या अस्त हो तो अच्छा-बुरा—मिला-जुला फल होता है । ६, ८, १२ इन घरों के मालिकों में से किसी एक की महादशा और किसी अन्य की अन्तर्दशा हो तो अशुभ फल होता है । इसी प्रकार ६, ८ या १२ इन स्थानों में से किसी एक स्थान में बैठे हुये ग्रह की महादशा हो और त्रिक* में बैठे हुये ही किसी अन्य ग्रह की अन्तर्दशा हो तो वह भी अशुभ होती है । २२ ॥ क्रूरग्रहस्यैव दशापहारे त्रिपञ्चसप्तर्क्षपतेर्विपाके । तथैव जन्माष्टमनाथभुक्तौ चोरारिपीड़ां लभतेऽतिदुःखम् ॥२३॥ यदि किसी क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें किसी ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा हो जो जन्म नक्षत्र से तीसरे, पाँचवे या साँतवे नक्षत्र का मालिक हो तो ऐसी परिस्थिति में जातक के घर में चोरी होती है, उसे शत्रु पीड़ा होती है और वह अति दुःखित रहता है । किस नक्षत्र का कौन सा स्वामी है यह पहिले बताया गया है । मान लीजिये किसी व्यक्ति का रेवती नक्षत्र में जन्म है तो रेवती, अश्विनी, *छठे, आठवें, बारहवें घर को त्रिक कहते हैं ।