फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ फलदीपिका अनेक बीमारियाँ हों, अपमान हो और बंधन को प्राप्त हो और कृष्णपक्ष के चन्द्रमा की तरह उसकी सारी सम्पत्ति का क्रमशः क्षय हो जावे। कोई भावेश यदि बलवान् हो तो उसकी दशा का शुभ फल बताया गया है। कोई भावेश यदि दुर्बल हो तो उसका अशुभ फल बताया है। इस कारण फल कहते समय केवल यही नहीं देखना चाहिये कि जिस ग्रह की महादशा है वह किस भवन का स्वामी है बल्कि यह भी देखना चाहिये कि वह बलवान् है या नहीं। संज्ञायां यदगाच्च कारकविधिश्व्लोकेषु यज्जल्पितं कर्माजीवनिरूपितं फलमिदं यद्रोगचिन्ताविधौ । यद्यस्येक्षणयोगसंभवफलं भावेशयोगोद्भवं भावेशैरपि भावगैरपि फलं वाच्यं दशायामिह ॥२१॥ ग्रहों की संज्ञा बताते समय जो कुछ प्रथम अध्याय में बताया गया है; कौन सा ग्रह किन किन वस्तुओं का कारक है इस सम्बन्ध में दूसरे अध्याय में जो कुछ बताया गया है; कौन सा ग्रह क्या कर्म कराता है और किस मार्ग से आजीविका दिलाता है इस सम्बन्ध में पंचम अध्याय में जो कुछ भी कहा गया है, और किस ग्रह से क्या रोग और किस प्रकार की चिन्ता होती है इस सम्बन्ध में जो चौदहवें अध्याय में वर्णन किया गया है; ग्रहों के, परस्पर दृष्टि और योग से जो फल होते हैं या किन्हीं दो भावेशों के मिलने से जो योग होता है तथा किसी भाव का स्वामी होने से तथा किसी भाव में बैठने से जो फल होता है, इस सब का विचार करके उस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा का फल कहना चाहिये। यह सब विषय पन्द्रहवें अध्याय से बीसवें अध्याय तक बताये गये हैं। ॥ २१ ॥