भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 684 में से

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बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९५ (viii) यदि अष्टमेश बिगड़ा हुआ हो तो उसकी महादशा में दरिद्रता, कष्ट, भय, भ्रमण, अपयश, व्याधि, अपमान आदि होते हैं— मृत्यु भी हो सकती है। बिगड़े हुये अष्टमेश की महादशा में शोक, मोह, मद, मात्सर्य आदि तथा मूर्च्छा के कारण बहुत अधिक मानसिक सन्ताप रहता है। ॥ १८ ॥ (ix) यदि नवमेश दुर्बल हो तो उसकी महादशा में जातक की स्त्री और पुत्र पर आपत्ति आती है। उसको दीनता आ घेरती है। पिता की मृत्यु हो जाती है। उससे दुष्कर्म बन पड़ते हैं। किसी गुरुजन की मृत्यु हो। नवम स्थान धर्म स्थान है इन कारण दुर्बल नवमेश की दशा में आपत्ति, विपत्ति, कष्ट आवें तो समझना चाहिये कि पहले जिस किसी देवता की उपासना की गई है उसमें कोई अपराध बन जाने के कारण यह सब अशुभ फल हो रहे हैं। (x) अब दुर्बल दशमेश की महादशा का फल बताते हैं। दशम कर्म स्थान है। इसका स्वामी निर्बल हो तो उसकी दशा में जो जो भी कर्म मनुष्य करता है वह सभी निष्फल होते हैं, जातक से निन्दित कार्य बन पड़े। घर से बाहर रहना पड़े इस कारण कष्ट हो। और अशुभ घटनायें हों। संक्षेप में यह है कि जातक का जीवन कष्टमय, मानहीन, निष्फल रहे। ॥ १९ ॥ (ix) यदि एकादशेश निर्बल और बिगड़ा हुआ हो तो भाई को कष्ट हो, पुत्र को बीमारी हो, जातक ठगा जाये, उसे कर्ण-रोग हो और उसमें शारीरक, मानसिक तथा आर्थिक दीनता आ जावे। इस महादशा या अन्तर्दशा में अशुभ समाचार भी सुनने को मिलते हैं। यहां इस ओर ध्यान आकर्षित कराया जाता है कि तृतीय से छोटे भाई का विचार किया जाता है, एकादश से बड़े भाई का। तृतीय से दाहिने कान का, एकादश से बाँये कान का। (xii) यदि बारहवें घर का मालिक दुर्बल हो तो जातक को

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