भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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यह बात ३७वें श्लोक में नहीं कही गयी । इससे परिणाम यह निकला कि जिस ग्रह की महादशा हो वह जब गोचरवश अस्त होता है या अनिष्ट राशि को प्राप्त होता है तो कष्टकारक होता है । अब दूसरी बात लीजिये । जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा हो वह जब गोचरवश अपनी स्वराशि या अपनी उच्चराशि को प्राप्त होता है या वक्र हो जाता है तो उस समय अच्छा फल देता है । पाकेशस्य शुभप्रदस्य भवनं तुङ्गं प्रपन्ने यदा सूर्ये तत्फलसिद्धिमेति गुरुणाऽप्येवं फलं चिन्तयेत् । नीचं कष्टफलप्रदस्य च दशानाथस्य वैरिस्थलं प्राप्ते भास्वति गोचरेण लभते तस्यैव कष्टं फलम् ॥३६॥ यदि कोई ग्रह शुभफल देने वाला है और उसकी दशा व अन्त- र्दशा चल रही है तो उसका शुभ फल किस समय होगा ? शुभफल तब होगा जब उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि में गोचरवश सूर्य जावे । या उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि में गोचरवश बृहस्पति जावे । मान लीजिये किसी जन्म-कुण्डली में शुक्र शुभ-प्रद है और उसकी महादशा या अन्तर्दशा चल रही है । शुक्र की उच्च राशि मीन है । ऐसी स्थिति में जब गोचरवश सूर्य मीन में आवेगा या जब वृहस्पति गोचरवश मीन राशि में आवेगा तब शुभ फल होगा । अब दूसरी बात लीजिये । कोई ग्रह जन्म-कुण्डली में कष्ट- प्रद है और उसकी दशा या अन्तर्दशा चल रही है तो विशेष कष्ट फल कब होगा ? जब उस ग्रह की नीच राशि में या उस ग्रह की शत्रु राशि में गोचरवश सूर्य आवे तब विशेष कष्ट होगा ॥ ३८ ॥ येन ग्रहेण सहितो भुजगाधिनाथ- स्तत्खेटजातगुणदोषफलानि कुर्यात् ।