फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० फलदीपिका केन्द्रेशस्य सतोऽसतोऽशुभशुभौ कुर्याद्दशा कोणपाः सर्वे शोभनदास्त्रिवैरिवभवपा यद्यप्यनर्थप्रदाः । रन्ध्रेशोऽपि विलग्नपो यदि शुभं कुर्याद्रविर्वा शशी यद्येवं शुभदः पराशरमतं तत्तद्दशायां फलम् ॥४१॥ यदि केन्द्र का मालिक सौम्य-ग्रह है तो वह अशुभ फल देता है और यदि केन्द्र का स्वामी अशुभ ग्रह हो तो शुभ फल देता है। त्रिकोण (लग्न से नवें, पाँचवे घर के स्वामी) के स्वामी हमेशा शुभ फल ही देते हैं । लग्न को केन्द्र स्थान भी मानते हैं कोण स्थान भी । इसलिये लग्नेश सदैव शुभ ही होता है । ३, ६, ११ के स्वामी चाहे शुभ हों अनर्थ करने वाले ही होते हैं । अष्टमेश यदि लग्नेश भी हो (यह तभी होता है जब जन्म लग्न मेष या तुला हो) तो शुभ होता है। अष्टमेश यदि सूर्य या चन्द्रमा हो तो भी शुभ फल करते हैं । यह तभी होता है जब धनु या मकर लग्न हो । इससे परि- णाम यह निकला कि मेष, तुला, धनु और मकर इन चार लग्नों के अतिरिक्त यदि कोई लग्न हो तो अष्टमेश अशुभ फल ही करता है । ऐसा पराशर का मत है ! ग्रह अपनी-अपनी दशा में अपना फल करते हैं ॥ ४१ ॥ कोणाधीशः केन्द्रगः केन्द्रपो वा कोणस्थश्चेद् द्वौ च योगप्रदौ स्तः । द्वावप्येतौ भुक्तिकाले दशाया- मन्योन्यं तौ योगदौ सोपकारौ ॥४२॥ केन्द्र, त्रिकोण आदि के स्वामियों के शुभ या अशुभ फल देने का विचार हमने सुगम ज्योतिष प्रवेशिका में विस्तृत रूप से दिया है । इसके लिये देखिये सुगमज्योतिष प्रवेशिका । इसी प्रकार तृतीयेश षष्ठेश, एकादशेश पापी हैं या नहीं इसका भी पूर्ण विवरण उसी पुस्तक में देखिये ।