फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४११ (i) कोण का स्वामी यदि केन्द्र में हो या (ii) केन्द्र का स्वामी, त्रिकोण में हो—ये दोनों ही योग देने वाले होते हैं। यदि इनमें से एक की दशा हो और दूसरे की अन्तर्दशा हो तो उस समय शुभफल होता है। इस प्रकार यह दोनों एक-दूसरे को योग प्रदान करते हैं और उपकार करते हैं ॥ ४२ ॥ न दिशेयुर्ग्रहाः सर्वे स्वदशासु स्वभुक्तिषु । शुभाशुभफलं नॄणामात्मभावानुरूपतः ॥४३॥ ऊपर श्लोक ४१ में कहा गया है कि "तत्तद्दशायां फलम्" अपनी- अपनी दशा में फल देते हैं तो क्या जिस ग्रह की महादशा होती है वह अपनी महादशा में अपनी अन्तर्दशा में ही पूर्ण फल प्रदान कर देता है ? नहीं । वही इस श्लोक में बताया है। सूर्य आदि सब ग्रह- अपनी महादशा और उसमें अपनी ही अन्तर्दशा में--एवं अपने- अपने भावों के अनुसार--मनुष्यों को शुभाशुभ फल प्रदान नहीं करते हैं। तब कब करते हैं ? यह आगे के श्लोक में बताया गया है ॥४३॥ आत्मसम्बन्धिनो ये च ये ये निजसधर्मिणः । तेषामन्तर्दशास्वेव दिशन्ति स्वदशाफलम् ॥४४॥ अपनी महादशा में जब अपने सम्बन्धी या सधर्मी ग्रहों की अन्तर्दशा आती है तब प्रत्येक ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल देता है। सम्बन्धी किसे कहते हैं ? देखिये अध्याय १५ का ३०वाँ श्लोक । सधर्मी किसे कहते हैं ? (क) अपने सदृश जो योग कारक अन्य ग्रह हैं वे सधर्मी हैं (ख) शुभ ग्रहों के अन्य शुभ ग्रह सधर्मी हैं (ग) पाप ग्रहों के अन्य पाप ग्रह सधर्मी हैं ॥४४॥