भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४१२ फलदीपिका केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम् । सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारको ॥४५॥ केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी—चाहे स्वयं दोष युक्त भी क्यों न हों—परस्पर सम्बन्ध से बली होने पर योग कारक होते हैं । दोष से क्या तात्पर्य है ? उदाहरण के लिये मेष लग्न में शनि दशमेश होने से केन्द्र पति हुआ किन्तु एकादश का भी स्वामी है और एकादश का स्वामी होना अच्छा नहीं, इस कारण दोष युक्त केन्द्र पति हुआ । इसी प्रकार सिंह लग्न में बृहस्पति पंचम के साथ-साथ अष्टम का भी स्वामी हुआ । इस कारण दोषयुक्त त्रिकोण पति हुआ । इस श्लोक में यही बताया गया है कि चाहे दोष युक्त ही क्यों न हों—केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध होने से ही उनमें बल आ जाता है और वे योग कारक हो जाते हैं ॥४५॥ त्रिकोणाधिपयोर्मध्ये सम्बन्धो येन केनचित् । केन्द्रनाथस्य बलिनो भवेद्यदि स योगकृत् ॥४६॥ दोनों त्रिकोण स्वामियों में—यदि किसी का भी सम्बन्ध बली केन्द्रनाथ से हो तो वह सम्बन्ध राजयोग कारक होता है। यहाँ यह भी बतलाना आवश्यक है कि ‘बली’ शब्द से क्या तात्पर्य है ? एक अर्थ तो साधारण है ही—बली अर्थात् बलवान् । “बली केन्द्रनाथ” का दूसरा पारिभाषिक अर्थ है—दशमेश—क्योंकि चारों केन्द्रेशों में वही सबसे बली माना जाता है। यह दूसरा अर्थ लेने से निष्कर्ष यह ‘सम्बन्ध’ या ‘बन्ध’ शब्द का प्रयोग ज्योतिष में एक विशेष अर्थ में होता है । इस शब्द की व्याख्या के लिये देखिये अध्याय १५ ।