फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ फलदीपिका योगकारकसम्बन्धात्पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः । तत्तद्भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगिकं फलम् ॥४८॥ पहले बता चुके हैं कि केन्द्रपति और कोणपति का सम्बन्ध होने से दोनों ही ग्रह (केन्द्रपति और कोणपति) राजयोगकारक माने जाते हैं। ऐसे योगकारक ग्रह की महादशा में यदि किसी शुभ- ग्रह की अन्तर्दशा हो—तो चाहे यह शुभ ग्रह महादशानाथ से सम्बन्ध न भी करता हो तो भी शुभ-ग्रह की अन्तर्दशा भाग्योदय ही करेगी। अब यह बताते हैं कि यदि कोई ग्रह नैसर्गिक पाप-ग्रह हो (मंगल, शनि) तो भी—यदि वह योग कारक से सम्बन्ध करते हों तो क्या फल होगा। योगकारक से सम्बन्ध करने वाले पाप ग्रहों की अन्तर्दशा 'हो तो उसमें योगफल मिलता है। विशेष विवरण के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका पृष्ठ १२१ तथा १३६ ॥ ४८ ॥ • स्वदशायां त्रिकोणेशो भुक्तौ केन्द्रपतेः शुभम् । दिशेत्सोऽपि तथा नो चेदसंबन्धेऽपि पापकृत् ॥४९॥ यदि केन्द्रपति सम्बन्धयुक्त हो तो अपनी दशा में, कोणपति की अन्तर्दशा में शुभफल कारक होता ही है। इसी प्रकार त्रिकोणेश भी अपनी दशा में और केन्द्रपति की अन्तर्दशा में शुभ फल दायक होता है। यदि केन्द्रकोण पतियों का सम्बन्ध न हो तो उतना शुभ नहीं होगा। यदि दोनों शुभ हों तो इन दोनों का चाहे सम्बन्ध हो या न हो एक की महादशा दूसरे की अन्तर्दशा में प्रायः शुभ फल ही होगा। हमारे विचार से यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश में सम्बन्ध न हो और एक की महादशा में दूसरे की अन्तर्दशा हो तो दोनों ग्रहों के विषय में यह भी विचारना चाहिये कि वे केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी होने के अतिरिक्त अन्य