फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१५ किन घरों के स्वामी हैं ? कहाँ बैठे हैं ? एक दूसरे से छठे, आठवें, बारहवें तो नहीं हैं ? बलवान् है या दुर्बल ? और तब जो निष्कर्ष आवे वह मानना चाहिये यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध नहीं है और केन्द्रेश अशुभ है तो पाप फल देगा ॥ ४९ ॥ केन्द्राधिपत्यदोषस्तु बलवान् गुरुशुक्रयोः । मारकत्वेऽपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥५०॥ पहले बता चुके हैं कि यदि केन्द्र का स्वामी शुभग्रह हो तो अच्छा नहीं । अब यह कहते हैं कि बृहस्पति और शुक्र यदि केन्द्र के स्वामी हों तो बहुत अधिक दोष हैं। यदि साथ ही साथ अर्थात् इन दोनों में से कोई केन्द्र का स्वामी तो हो ही—मारक स्थान अर्थात् द्वितीय या सप्तम में बैठा हो तो प्रबलमारक होता है ॥ ५० ॥ बुधस्तदनु चंद्रोऽपि भवेत्तदनु तद्विधः । पापाश्चेत्केन्द्रपतयः शुभदाश्चोत्तरोत्तरम् ॥५१॥ जैसे गुरु और शुक्र का केन्द्रेश होना और मारक स्थान में बैठना दोषयुक्त माना गया है वैसे ही बुध और चन्द्रमा को भी समझना चाहिये । अर्थात् बुध यदि केन्द्र का स्वामी हो तो शुभ नहीं होता और यदि केन्द्र का स्वामी होकर मारक स्थान में बैठा हो तो और भी खराब समझना चाहिये । इसी प्रकार चन्द्रमा का केन्द्रेश होना अच्छा नहीं और यदि चन्द्रमा केन्द्रेश होकर मारक स्थान में बैठ जाये तो और भी खराब है। किन्तु यदि पाप ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो वह शुभफल देने वाले होते हैं । सूर्य यदि केन्द्रेश हो तो उत्तम फल देगा । मंगल यदि केन्द्रेश हो तो और भी उत्तम फल देगा । और यदि शनि केन्द्रेश हो तो और भी अच्छा ॥ ५१ ॥