फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ फलदीपिका यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ । नाथेनान्यतरस्यैव संबन्धाद्योगकारकौ ॥५२॥ यदि राहु या केतु केन्द्र में बैठा हो और त्रिकोणेश से सम्बन्ध करता हो तो योग कारक होता है । अथवा यदि राहु या केतु त्रिकोण में बैठा हो और केन्द्रेश से सम्बन्ध करता हो तो भी राजयोग कारक होता है ॥ ५२ ॥ तमोग्रहौ शुभारूढौऽसंबद्धौ येन केनचित् । अन्तर्दशानुरूपेण भवेतां योगकारकौ ॥५३॥ यदि राहु या केतु शुभग्रह की राशि और अच्छे स्थान में बैठे हों और किसी ग्रह से सम्बन्ध न करते हो तो अपनी अन्तर्दशा में शुभ फल देते हैं । यदि राहु या केतु का किसी से सम्बन्ध नहीं है और शुभ स्थान में है (केन्द्र या त्रिकोण में) तो इनकी महादशा में जब योग कारक ग्रह की अन्तर्दशा आवेगी तब शुभ फल होगा ॥ ५३ ॥ आरम्भो राजयोगस्य भवेन्मारकभुक्तिषु । प्रथयन्ति तमारभ्य क्रमशः पापभुक्तयः ॥५४॥ यदि किसी मारक ग्रह की अन्तर्दशा में राजयोग का आरम्भ हो तो उस दशाकाल में केवल राजपद की प्रसिद्धि हो जाती है— राजोचित ऐश्वर्य किंवा भोग आदि की प्राप्ति नहीं होती ॥ ५४ ॥ रन्ध्रस्थरन्ध्रेशकरन्ध्रनाथ- रन्ध्रत्रिभागाधिपमान्दिभेशाः ।