भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१७ दुःखप्रदास्तेष्वपि दुर्बलो यः स नाशकारी स्वदशापहारे ॥५५॥ नीचे लिखे हुए ग्रह बहुत दुःख देने वाले होते हैं—(१) जो ग्रह आठवें घर में बैठा हो (२) जो ग्रह आठवें घर को देखता हो (३) अष्टमेश (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (५) जिस राशि में मान्दि हो, उसका स्वामी । कहने का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा में बहुत कष्ट देते हैं और इन ग्रहों में जो सबसे दुर्बल हो उसकी दशा या अन्तर्दशा में मृत्यु होती है ॥५५॥ भ्रष्टस्य तुङ्गादवरोहिसंज्ञा मध्या भवेत्सा सुहृदुच्चभागे । आरोहिणी निम्नपरिच्युतस्य नीचारिभांशेष्वधमा भवेत्सा ॥५६॥ पहले बताया जा चुका है कि किसी राशि के किस अंश पर कौनसा ग्रह परम उच्च होता है और किस राशि के किस अंश पर परम नीच होता है । उदाहरण के लिये मेष राशि के दस अंश पर सूर्य परम उच्च होता है और तुला राशि के दस अंश पर सूर्य परम नीच होता है । तो तुला के दस अंश से निकल कर जब तक मेष के दस अंश पर सूर्य नहीं पहुँचेगा तब तक उसे आरोही अर्थात् चढ़ता हुआ कहेंगे । अपने उच्च (ऊँचे) भाव की ओर जा रहा है इसलिये चढ़ता हुआ कहा और मेष के १० अंश को श्लोक ५४ की विस्तृत व्याख्या के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका । फलदीपिका के श्लोक के द्वितीय चरण में “कारक भुक्ति षु” यह लिखा था किन्तु लघुपाराशरी में इसी श्लोक में “मारक भुक्तिष” यह पाठ है जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । वही पाठ हमने इसमें शुद्ध कर दिया है ।