भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 684 में से

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पृष्ठ 419

४१८ फलदीपिका पार कर जब तक तुला के दस अंश तक सूर्य न पहुँचे तब तक उसे अवरोही अर्थात् उतरता हुआ कहते हैं । अपनी नीच राशि की ओर जा रहा है इसलिये उतरता हुआ कहा । यदि किसी अवरोही ग्रह की दशा हो तो उत्तम नहीं; यदि किसी आरोही ग्रह की दशा हो तो उत्तम है । किन्तु चाहे अवरोही ही हो, दशा यदि ग्रह अपने मित्र के नवांश में या उच्च नवांश में हो तो उतनी ख़राब नहीं होती बल्कि यह कहना चाहिये कि साधारणतया अच्छी हो जाती है । लेकिन इसके विपरीत चाहे कोई ग्रह आरोही ही क्यों न हो, यदि वह नीच राशि या शत्रु राशि या नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो अधम होती है, उसकी दशा खराब जाती है । नीचे क, ख, ग इन तीन गुणों में सब में ग्रह अच्छा हो तो बहुत अच्छा फल । सब में तीनों क, ख, ग में खराब हो तो खराब फल । क, ख, ग में किसी में अच्छी स्थिति, किसी में ख़राब स्थिति तो तारतम्य के अनुसार मिश्रित फल । क (i) आरोही अच्छा (ii) अवरोही खराब ख (i) उच्च राशि अधिमित्र राशि अच्छा मित्र राशि (ii) नीच राशि अधिशत्रु राशि खराब शत्रु राशि ग (i) उच्च नवांश वर्गोत्तम नवांश उत्तम अधिमित्र या मित्र नवांश (ii) नीच नवांश अधिशत्रु या खराब शत्रु नवांश