भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 684 में से

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बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१९ “बृहत् जातक” के अष्टम अध्याय में इसे बहुत अच्छी तरह समझाया गया है। (क) यदि कोई ग्रह बहुत बलवान् हो या परमोच्च हो तो उसकी दशा सम्पूर्ण धन और आरोग्य को देने वाली होती है। (ख) यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में है और किंचित् बल युक्त भी है तो उसकी दशा पूर्णा कहलाती है। इसकी दशा--अन्त- र्दशा में धन वृद्धि होती है। (ग) यदि कोई ग्रह निर्बल हो तो उसकी दशा रिक्ता कहलाती है। रिक्ता दशा में स्वास्थ्य और धन की कमी रहती है और रोग तथा दरिद्रता की बहुतायत रहती है। (घ) यदि कोई ग्रह नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो अनिष्ट फला कहलाती है। इसमें शारीरिक और धन विषयक कष्ट होता है। (ङ) यदि कोई ग्रह अवरोही हो किन्तु मित्र या अधिमित्र नवांश में हो तो मध्या कहलाती है। इसमें किंचित् वृद्धि होती है ॥ ५६ ॥ शस्तगृहे शस्तांशे नीचे रिपुभेऽस्तसंस्थिते वाऽपि । तस्य दशा मिश्रफला दशापरार्धे फलप्रदा ज्ञेया ॥५७॥ चाहे कोई ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि में ही क्यों न हो-चाहे कोई ग्रह अस्त ही क्यों न हो यदि वह उत्तम भाव और उत्तम नवांश में हो तो उसकी दशा को मिश्र फला अर्थात् मिला-जुला फल देने वाली कहेंगे। वराहमिहिर के मत से उस ग्रह की दशा को मिश्र- फला कहते हैं जो ग्रह अपनी उत्तम राशि में हो (उच्च राशि या अपनी राशि में हो) किन्तु नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो उस ग्रह की दशा मिली-जुली होती है। कभी आरोग्य, कभी धन, कभी व्याधि, कभी दरिद्रता। मन्त्रेश्वर महाराज के मत से मिश्रफला का शुभ प्रभाव उत्तरार्द्ध में होता है ॥ ५७ ॥ तत्तद्भावात् व्ययस्थस्य तद्भावव्ययपस्य च । वीर्यहीनस्य खेटस्य पाके मृत्युमवाप्नुयात् ॥५८॥

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