भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४२० फलदीपिका यदि कोई ग्रह वीर्यहीन अर्थात् बलहीन हो तो उसकी दशा- अन्तर्दशा में मृत्यु होगी। किसकी ? जिस भाव से निर्बल ग्रह द्वादश में बैठा है उस भाव से जिसका विचार किया जाता है उसकी या, जिस भाव का दुर्बल ग्रह व्ययेश है, उस भाव से जिसका विचार किया जाता है उसकी। एक उदाहरण द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है। मान लीजिये कोई दुर्बल ग्रह द्वितीय का मालिक होकर नवम में बैठा है तो इसकी दशा-अन्तर्दशा में जातक के भाई की या पिता की मृत्यु हो सकती है। क्यों ? वह द्वितीयेश है। अर्थात् तीसरे घर का व्ययेश है। तीसरे घर से १२वाँ लग्न दूसरा घर हुआ इसलिए द्वितीयेश तृतीय स्थान का व्ययेश हुआ और ऊपर बताया जा चुका है कि जिस भाव का व्ययेश दुर्बल हो उस भाव का नाश होता है। तृतीय से भाई का विचार किया जाता है इसलिए बलहीन द्वितीयेश की दशा में भाई को कष्ट कहना । दूसरी बात जो इस श्लोक में बतायी है वह यह कि जिस भाव के व्यय स्थान में दुर्बल ग्रह बैठे उस भाव को भी कष्ट पहुँचाता है। ऊपर के उदाहरण में दशम से यदि पिता का विचार किया जाय तो नवम में दुर्बल ग्रह बैठा हुआ, दशम के व्यय में होने के कारण पिता को कष्ट पहुँचावेगा। नतीजा यह निकला कि दुर्बल ग्रह जिस भाव का व्ययेश हो उसका भी नाश करे और जिस भाव के व्यय में बैठे उसका भी नाश करे ॥ ५८ ॥ अब यह बताते हैं कि दशानाथ के गोचर से उसकी दशा के प्रभाव में क्या अन्तर होता है। दशापतिर्लग्नगतो यदि स्यात् त्रिषट्दशैकादशगश्च लग्नात् । तत्सप्तवर्गेऽप्यथ तत्सुहृद्वा लग्ने शुभो वा शुभदा दशा स्यात् ॥५६॥