भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२१ जिस ग्रह की दशा हो वह गोचरवश लग्न में या लग्न से तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें यदि आवे तो उसकी दशा शुभ जाती है । या यदि दशानाथ लग्न से सप्तम में आता है तो भी दशा शुभ जाती है । यदि दशानाथ का मित्र गोचरवश लग्न में आवे या कोई शुभ ग्रह गोचरवश लग्न में जा रहा हो तो भी दशा अच्छी जाती है ॥ ५९ ॥ यावन्ति वर्षाणि दशा च सा स्यात्- चारक्रमात्तत्र दशापतिः सः । यत्र स्थितस्तद्भवनाद्विधोस्तु स्थितेः प्रकल्प्यं सदसत्फलं हि ॥६०॥ यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा जा रही है वह इस समय गोचरवश जन्मकालीन चन्द्रमा से किस स्थान पर है । जिस समय दशानाथ जन्मकालीन चन्द्रमा से उत्तम स्थानों पर रहेगा उस समय अच्छा प्रभाव दिखावेगा और जिस समय गोचरवश जन्म राशि से अनिष्ट स्थानों पर रहेगा उस समय अनिष्ट फल दिखावेगा ॥६०॥ दशाधिनाथस्य सुहृद्गृहस्थ- स्तदुच्चगो वाऽथ दशाधिनाथात् । स्मरत्रिकोणोपचयोपगश्च ददाति चन्द्रः खलु सत्फलानि ॥६१॥ चन्द्रमा जब गोचरवश नीचे लिखे किसी स्थान पर होता है तो शुभ फल दिखाता है । (क) दशानाथ के मित्र के घर में (ख)