भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४२२ फलदीपिका दशनाथ जिस राशि में होता है उस राशि में । (ग) दशनाथ जिस राशि में है उससे ३, ५, ६, ७, ९, १०, ११वें घर में ॥६१॥ उक्तेषु राशिषु गतस्य विधोः स राशिः । स्याज्जन्मकालभवमूर्तिधनादिभावः । तत्तद्विवृद्धिकृदसौ कथितो नराणां तद्भावहानिकृदथेतरराशिसंस्थः ॥६२॥ ऊपर के श्लोक में यह बताया गया है कि चन्द्रमा किन-किन स्थानों पर शुभ होता है। अन्य स्थानों पर अशुभ समझना चाहिये । शुभ स्थान जिस भाव में पड़े, वह यदि लग्न, धन लाभ आदि में हो तो उसकी वृद्धि होगी। उपर्युक्त प्रकार से चन्द्रमा जिस भाव में अशुभ हो वह अशुभ स्थान जन्मकुण्डली के जिस भाव में पड़े उस भाव की हानि होगी। मान लीजिये मेष लग्न है और दशनाथ बृहस्पति है जो धनु राशि में बैठा है तो बृहस्पति की उच्च राशि कर्क है इस कारण कर्क का चन्द्रमा शुभ होगा। ६१वें श्लोक में जो शुभ स्थान गिनाये हैं उनमें मकर नहीं है इस कारण मकर अशुभ स्थान हुआ । इसलिये कर्क राशि अर्थात् लग्न से चौथे भाव को चन्द्रमा बढ़ावेगा और मकर राशि अर्थात् लग्न से दशम भाव को चन्द्रमा कष्ट पहुँचावेगा ॥ ६२ ॥ सारावलीमुडुदशां च वराहहोरा- मालोक्य जातकफलं प्रवदेन्नराणाम् । प्रश्नोदयग्रहवशादथ वा स्वजन्म- राश्यादिना वदतु नास्त्यनयोर्विशेषः ॥६३॥ सारावली (यह कल्याण वर्मा विरचित फलित ज्योतिष का संस्कृत ग्रन्थ है), उडुदशा (उडदाय प्रदीप, उडुदशा या नक्षत्रदशा सम्बन्धी