भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२३ फलित ज्योतिष का ग्रन्थ है) तथा वराहमिहिर रचित होराशास्त्र के आधार पर जातक की कुण्डली का फलादेश करना चाहिये । अथवा प्रश्न कुण्डली बना कर उससे फलादेश करे या जातक की जन्म राशि से विचार करें । इनमें कोई विशेष अन्तर नहीं आता । मन्त्रेश्वर महाराज के विचारानुसार जन्म कुण्डली के आधार पर जैसे सुचारु रूप से फलादेश किया जा सकता है वैसे ही जन्म राशि तथा प्रश्न- कुण्डली पर से भी—उतना ही अच्छा विचार किया जा सकता है । भावार्थ रत्नाकर के कुछ योग निचे दिये हैं :— धन योग विचार १. यदि दूसरे घर का स्वामी पाँचवें हो और पाँचवे घर का स्वामी दूसरे, अथवा दूसरे घर का स्वामी ग्यारहवें हो और ग्यारहवें का स्वामी दूसरे अथवा पाँचवें घर का स्वामी पाँचवें और नवें का स्वामी नवें घर में हो तो विशेष धन योग होता है । २. यदि द्वितीय और लाभ के स्वामियों के साथ अन्य भवन का स्वामी भी बैठा हो तो उतना धन योग नहीं होता —जितना केवल धनेश लाभेश के योग से होगा । यहाँ यह भी तारतम्य कर लेना चाहिये कि वह अन्य स्थान का स्वामी—जो धनेश, लाभेश के साथ बैठा है—कौन है । लग्नेश होगा तो शुभ ही होगा। चतुर्थेश यदि साथ में बैठ जाता है तो उत्तम है किन्तु यदि छठे, बारहवें या आठवें का स्वामी साथ में बैठ जावेगा तो धनेश लाभेश की एकत्र स्थिति के योग को भ्रष्ट करेगा । साथ ही यह भी विचार करना चाहिये कि पंचमेश, या नवमेश