फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२८ फलदीपिका ९. यदि क्षत्रियों की जन्मकुण्डली में दसवें घर का स्वामी तीसरे घर में हो तो राजयोग में न्यूनता करता है (पं० जवाहर लाल की जन्म कुण्डली में दसवें का मालिक तीसरे में था। संभवतः केन्द्र या कोण में होता तो उनको जल्दी राजयोग प्राप्त हो जाता)। पंडित जी ब्राह्मण थे। पहिले क्षत्रिय ही राजा होते थे इसलिये क्षत्रिय कहा। १०. यदि दूसरे और तीसरे घर के स्वामी एक साथ बैठे हो तो जातक उदार होता है। ११. दूसरे और तीसरे घर के मालिक से शनि का सम्बन्ध हो तो मनुष्य बहुत लोभी होता है। १२. यदि तीसरे घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें तो भाइयों की मृत्यु हो। अर्थात् वे अल्पायु हों। यदि वहां (छठे, ८, वें १२वें) शुभ ग्रह से युक्त तृतीयेश हो तो भाइयों की मृत्यु करावेगा किन्तु दीर्घ काल के बाद। चतुर्थ भाव (वाहन) का विचार १. यदि चौथे और नवें घर के स्वामी लग्न में हों तो यह भाग्य वृद्धि तथा सवारी* का योग उत्पन्न करते हैं। २. यदि बृहस्पति चौथे घर में हो या चौथे को देखता हो तो जातक को बहुत सुख प्राप्त होता है। ३. यदि चौथे घर का स्वामी और बृहस्पति केन्द्र या कोण में एक साथ हों तो जातक को सुख प्राप्त होता है।
- पहिले सवारी का अर्थ होता था, हाथी, घोड़ा, पालकी, रथ इत्यादि अब सवारी का अर्थ है, स्कूटर, मोटर, जहाज़ आदि।