फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४१ ६. यदि राहु की महादशा हो तो उसमें राहु केतु-शनि या सूर्य की अन्तर्दशा में पिता की मृत्यु हो सकती है । ७. यदि केतु की दशा हो तो उसमें मंगल, शनि, सूर्य या राहु की अन्तर्दशा जातक के पिता की मृत्यु कर सकती है । ८. यदि मंगल की दशा हो तो उसमें राहु, केतु या शनि की अन्तर्दशा में जातक के पिता का मरण हो सकता है । ९. यदि शनि की महादशा हो तो उसमें राहु, केतु, सूर्य या मंगल की अन्तर्दशा में पिता का मरण हो सकता है । १०. मंगल की महादशा का अन्त हो और राहु प्रारम्भ होने वाला हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है । ११. यदि क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें राहु की अन्तर्दशा हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है । १२. यदि बृहस्पति और शुक्र वृश्चिक में हों और शुक्र की दशा आवे तो शुक्र दशा राजयोग कारक होती हैं, इसमें संशय नहीं है । १३. यदि सूर्य और बुध एक साथ हों या कन्या का सूर्य, सिंह का बुध हो तो बुध की दशा प्रबल होती है; सूर्य की दशा मध्यम होती है । १४. यदि चन्द्रमा और मंगल का सम्बन्ध हो तो चन्द्र की दशा बहुत योग देने वाली होती है, मंगल की दशा मध्यम होती है । १५. यदि बृहस्पति और शनि का सम्बन्ध हो तो शनि की दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है; बृहस्पति की महादशा मध्यम होती है । १६. यदि मंगल और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो मंगल की दशा उत्तम होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है । १७. यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो चन्द्र दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है ।