फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ फलदीपिका १८. यदि राहु केन्द्र या कोण में हो तो स्वतंत्र राजयोग है । जातक को बहुत यश प्राप्त होता है । १९. यदि बुध, बृहस्पति और शुक्र का सम्बन्ध हो तो यह विशेष धन योग है, जातक भाग्यवान् और यशस्वी होता है । २०. यदि शुक्र का बुध या बृहस्पति से सम्बन्ध हो, शुक्र की दशा में धन योग होता है । बृहस्पति की दशा में जातक धन हीन होता है और बुध की दशा मिला जुला फल देती है अर्थात् कभी धनागम कभी धन की हानि । २१. यदि सूर्य किसी ग्रह के साथ हो तो सूर्य की दशा में धनागम, अन्य ग्रह मध्यम फल देता है । २२. यदि राहु का अन्य ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जो ग्रह सबसे प्रबल होगा राहु उसका फल देगा । २३. यदि राहु, सूर्य और शनि एक साथ तृतीय में हों तो राहु की दशा, अन्तर्दशा पराक्रम और भाग्योदय करती है । २४. यदि बुध तृतीय में हो तो राहु की दशा में जातक धैर्य हीन (कातर, या डरपोक) हो जाता है । ग्रह सामान्य योग तरंग १. यदि किसी भाव का स्वामी-उस भाव के कारक से संयुक्त हो तो उस भाव की प्रबलता होती है अर्थात् वह भाव पुष्ट होता है। किस भाव का कौन सा कारक होता है यह फलदीपिका के अध्याय १५ श्लोक १७ में बताया गया है। उदाहरण के लिये पंचम कारक बृहस्पति है और सप्तम कारक शुक्र है। यदि पंचमेश बृहस्पति के साथ हो या सप्तमेश शुक्र के साथ हो तो पंचम भाव या सप्तम भाव पुष्ट होगा ।