फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४७ ७. अष्टमेश की दशा में स्वयं उसकी अन्तर्दशा मारक हो सकती है। ८. अष्टमेश की दशा में—षष्ठ स्थान स्थित पापी की दशा मारक हो सकती है। ९. षष्ठेश की महादशा में, अष्टम में स्थित ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १०. अष्टमेश की दशा में, अष्टमेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। ११. अष्टमेश की दशा में षष्ठेश के साथ बैठे हुए ग्रह की दशा मारक हो सकती है। १२. अष्टम स्थान में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में षष्ठेश की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १३. षष्ठेश की महादशा में अष्टमेश की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १४. षष्ठ स्थान में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में अष्टम स्थान स्थित ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १५. षष्ठेश की दशा में—अष्टमेश की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १६. अष्टम में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में—षष्ठ स्थान स्थित पाप ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। यह जो षष्ठेश, अष्टमेश या व्ययेश या षष्ठ, अष्टम द्वादश स्थित ग्रहों के मारकेश होने के नियम बतलाये हैं उन्हें निम्नलिखित रूप से अच्छी तरह समझा जा सकता है। उपर्युक्त योगों का निष्कर्ष यह निकला कि मारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा, निश्चित करने के लिये नियमों का सार यह है :— (i) अष्टमेश की महादशा में :— (क) अष्टमेश की अन्तर्दशा (ख) षष्ठ स्थान स्थित