फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 449, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें४४८ फलदीपिका पापी ग्रहों की अत्तर्दशा (ग) षष्ठेश से युक्त ग्रह की अन्तर्दशा (घ) अष्टमेश से वीक्षित ग्रह की अन्तर्दशा । (ii) अष्टम स्थान स्थित यदि पापी ग्रह हो तो उसकी महा- दशा में :— (क) षष्ठेश की अन्तर्दशा (ख) षष्ठ स्थान स्थित पापी की अन्तर्दशा । (iii) षष्ठेश की महादशा में :— (क) अष्टमेश की अन्तर्दशा (ख) अष्टम स्थान स्थित ग्रह की अन्तर्दशा । (iv) षष्ठ स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा में :-- (क) अष्टमेश की अन्तर्दशा । अष्टमेश अष्टम में हो तो भी उसकी अन्तर्दशा । (v) व्ययेश की महादशा में :— (क) धनेश की अन्तर्दशा (ख) द्वितीयेश के साथ बैठे हुए ग्रह की अन्तर्दशा (ग) द्वितीयेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा (घ) व्यय में बैठे हुए पाप ग्रह की अन्तर्दशा (ङ) व्ययेश के साथ द्वितीय में बैठे हुए पाप ग्रह की अन्तर्दशा । (vi) व्यय में पापी ग्रह हो तो उसकी महादशा :-- (क) द्वितीयेश से सम्बन्धित पाप ग्रह की अन्तर्दशा । (vii) द्वितीयेश की महादशा में :-- (क) व्ययेश की अन्तर्दशा (ख) व्यय में बैठे हुए और व्ययेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा । मारक निर्णय करने के लिये मारक तरंग में अन्य योग निम्न- लिखित हैं :— १७. यदि बुध और शुक्र दोनों एक साथ पंचम में हों तो एक