भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 684 में से

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पृष्ठ 450

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४९ दूसरे की महादशा, अन्तर्दशा में मारक हो सकते हैं। बुध में शुक्र, शुक्र में बुध। आधिपत्य का विचार भी कर लेना चाहिये। १८. यदि मंगल मारक स्थान या अनिष्ट का स्वामी हो (मूल श्लोक में लिखा है कि यदि मंगल को क्रूराधिपत्य हो) तो मंगल की दशा मारक होती है। १९. चाहे शनि अच्छे घरों का मालिक हो यदि मारक ग्रह के साथ हो तो प्रबल मारक होता है। २०. यदि अष्टमेश लग्न में हो तो अपनी महादशा में मारक होता है। २१. यदि किसी व्यक्ति के दो या तीन पुत्रों को राहु की महा- दशा जा रही हो तो जातक का निधन होता है। उपर्युक्त महादशा तथा अन्तर्दशा के साथ-साथ दीर्घायु, मध्यायु, अल्पायु योगों के आधार पर मृत्यु की संभावना का भी विचार कर लेना चाहिये। अन्यथा षष्ठ, अष्टम, व्यय स्थित किंवा इन भावों के स्वामियों की दशा, अन्तर्दशा आती जाती ही रहती है। मृत्यु नहीं होती। धन आदि की कमी कर देती है। या शत्रु रोग आदि से पीड़ा होती है। ग्रंथकार श्री रामानुज का कहने का अभिप्राय यह है कि छठा, आठवां, बारहवां दुःस्थान है। इनके स्वामी और इन भावों में बैठे पापी ग्रह कष्ट कारक होते हैं। जातक चन्द्रिका के मत से निम्नलिखित ग्रह मारक होते हैं :— (i) दूसरे घर का मालिक। (ii) दूसरे घर में बैठे हुए पाप ग्रह। (iii) सातवें घर का मालिक। (iv) सातवें घर में बैठे हुए पाप ग्रह। (v) दूसरे घर के मालिक से युत पाप ग्रह। (vi) सातवें घर के मालिक से युत पाप ग्रह।