फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
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४५० फलदीपिका (vii) अष्टमेश । (viii) तृतीय या अष्टम का मालिक यदि द्वितीय या सप्तम के मालिक के साथ हो । (ix) मारक ग्रह के साथ बैठा हुआ शनि । (x) षष्ठेश । (xi) जो ग्रह जन्म कुंडली में सबसे निर्मल हो । द्वितीय मुख का स्थान है । सप्तम गुप्तेन्द्रिय का स्थान है । प्रसिद्ध है कि आहार (मुख) और विहार (स्त्री संग) जितना नियमित होगा, उतनी आयु अच्छी होगी। जितना मनुष्य अपने द्वितीय और सप्तम स्थान को बिगाड़ेगा, उतना ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार कर अपनी आयु को नष्ट करेगा। पृष्ठ ४२३ से पृष्ठ ४५० तक भावार्था रत्नाकर में दिये गये फलित ज्योतिष सम्बन्धी २२५ नियम बतलाये गये हैं । जिससे पाठकों को लाभ हो ।