भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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पृष्ठ 457

४५६ फलदीपिका (viii) सूर्य में जब केतु की अन्तर्दशा होती है तो किसी मित्र की मृत्यु हो या मित्र मित्रता छोड़ दे । अपने आदमियों से और कुटुम्ब के लोगों से विग्रह (झगड़ा) हो । शत्रु से भय हो । धन का नाश हो (चोरी से या किसी अन्य प्रकार से), किसी गुरुजन को बीमारी हो । जातक के पैर में तथा सिर में बहुत दर्द हो । सूर्य और केतु परस्पर शत्रु हैं इस कारण सूर्य में केतु का बहुत दुष्ट फल कहा गया है ॥१०॥ (ix) सूर्य की महादशा में शुक्र का अन्तर जब आवे तो सिर में पीड़ा, पेट में रोग हो, गुदा में पीड़ा हो, खेती बाड़ी के काम, मकान, धन और अन्न में कमी हो, बच्चे बीमार पड़ें । स्त्री बीमार हो ॥११॥ चन्द्रमा की महादशा में एविध अन्तर्दशाओ का फल स्त्रीप्रजाप्तिरमलांशुकागमो भूसुरोत्तमसमागमो भवेत् । मातुरिष्टफलमङ्गनासुखं स्वां दशां विशति शीतदीधितौ ॥१२॥ पित्तवह्निरुधिरोद्भवा रुजः क्लेशदुःखरिपुचोरपीडनम् । वित्तमानविहतिर्भवेत्कुजे शीतदीधितिदशान्तरं गते ॥१३॥ तीव्रदोषरिपुवृद्धिबन्धुरुङ् मारुताशनिभयार्तिरुद्भवेत् । अन्नपानजनितज्वरोदयाश्चन्द्रवत्सरविहारके ह्यहौ ॥१४॥ दानधर्मनिरतिः सुखोदयो वस्त्रभूषणसुहृत्समागमः । राजसत्कृतिरतीव जायते कैरवप्रियवयोहरे गुरौ ॥१५॥