भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४५७ नैकरोगविहतिः सुहृत्सुत- स्त्रीरुजा व्यसनसंभवो महान् । प्राणहानिरथवा भवेच्छनौ मारबन्धुवयसो गतेऽन्तरम् ॥१६॥ सर्वदा धनगजाश्वगोकुल- प्राप्तिराभरणसौख्यसम्पदः । चित्तबोध इति जायते विधो- रायुषि प्रविशति प्रबोधने ॥१७॥ चित्तहानिरपि सम्पदश्च्युति- र्बन्धुहानिरपि तोयजं भयम् । दासभृत्यहतिरस्ति देहिनां केतुके हरति चान्द्रमब्दकम् ॥१८॥ तोययानवसुभूषणाङ्गनाविक्रयक्रयकृषिक्रियादयः । पुत्रमित्रपशुधान्यसंयुतिश्चन्द्रदायहरगोन्मुखे भृगौ ॥१९॥ राजमाननमतीव शूरता रोगशान्तिररिपक्षविच्युतिः । पित्तवातरुगिने गते तदा स्याच्छशाङ्कपरिवत्सरान्तरम् ॥२०॥ (i) जब चन्द्रमा की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा हो तो कन्या-सन्तति की प्राप्ति हो, उज्ज्वल वस्त्र मिलें, उत्तम ब्राह्मणों