भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६१ परिजनपरिहानिर्जायते मानवाना- मपहरति यदायुर्भौमिजं भार्गवेन्द्रः ॥२७॥ नृपकृतपरिपूजा युद्धलब्धप्रभावः परिजनधनधान्यश्रीमदन्तःपुरं च । अतिविलसितवृत्तिः साहसादाप्तलक्ष्मी- स्तिमिरभिदि कुजायुर्दायसंहारिणीति ॥२८॥ विविधधनसुताप्तिर्विप्रयोगोऽरिवर्गे- र्वसनशयनभूषारत्नसम्पत्प्रसूतिः । भवति गुरुजनातिर्गुल्मपित्तप्रपीडा धरणीतनयवर्षे शीतगौ सम्प्रयाते ॥२६॥ (i) मंगल की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : पित्त, उष्णता (गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोग हों)—घाव होने या चोट लगने का भय हो, भाइयों से वियोग हो । जाति के लोगों से, शत्रुओं से, राजा से तथा चोरों से विरोध हो । अग्नि पीड़ा का भय हो । किन्तु जातक को खेत और मुकदमों से धन की प्राप्ति हो । हमारा अनुभव है कि मंगल यदि योग कारक हो तो तो उसकी दशा अच्छी हो जाती है । मंगल बलवान् होने से जातक के विरोधी उत्पन्न होने पर भी विजय जातक की होती है । किन्तु यदि मंगल बिगड़ा हुआ हो तो जातक को शत्रुओं से पीड़ा पहुँचती है ॥२१॥ (ii) मंगल की महादशा में राहु का फल : शस्त्र, अग्नि चोर, रिपु (शत्रु) राजा—इन सब से भय हो । विष के कारण बीमारी या कष्ट हो । किसी गुरुजन या बन्धु की हानि हो । जातक के काँख, आँख और सिर में बीमारी हो । जातक की मृत्यु हो जाये या उस पर महान् आपत्ति आवे ॥२२॥