भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४६२ फलदीपिका (iii) मंगल की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : इस अन्तर्दशा में शुभ फल होते हैं। अशुभ फल तो केवल इतना ही है कि कान में पीड़ा हो और कफ के कारण शरीर में रोग हो। बाकी सब शुभ फल ही हैं। जातक के पुत्र और मित्रों में वृद्धि हो, देवताओं और ब्राह्मणों, की अर्चना हो, सदैव अतिथि पूजा का अवसर मिले। पुण्य कर्मों मे प्रसक्ति हो और तीर्थों में यात्रा हो ॥२३॥ (iv) मंगल की महादशा में शनि की अन्तर्दशा : यह समय बहुत कष्ट कारक होता हैं। जातक के पुत्र, गुरुजन और पुरखों पर एक के बाद एक विपत्ति आती है। जातक स्वयं विपत्तियों का शिकार होता है। शत्रु उसका धन हर लेते हैं। अग्नि और वायु से भय हो--सम्पत्ति आदि चली जावे या पित्त और वात के प्रकोप के कारण शरीरिक रोग हो। जातक के शत्रु उसका धन हर ल। उसकी धन हानि हो और मन को भीतर ही भीतर दुःख पहुचाने वाली घटनायें घटित हों ॥२४॥ (v) मंगल की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : राजा से या सरकार से पीड़ा हो। किसी शूद्र जाति के वैरी के कारण बहुत कष्ट हो। शत्रुओं से भय हो, चोर उपद्रव करे और धन की हानि हो। पशु, हाथी और घोड़ों का नाश हो और शत्रुओं से समागम हो। अब पशु, हाथी या घोड़े तो प्रायः लोग रखते नहीं। तात्पर्य यह है कि ख़राब फल हो ॥२५॥ (vi) मंगल की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : अकस्मात् वज्र से भय हो, अग्नि और शस्त्र से पीड़ा हो, अपने देश से जाना पड़े या धन नाश हो और या तो जातक के स्वयं के प्राण छूट जायें या उसकी स्त्री का नाश हो जाये ॥२६॥ (vii) मंगल की महादशा में शुक्र के अन्तर का फल : युद्ध में पराजय, अपना स्वदेश छोड़ना पड़े और विदेश में जाकर