फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
४६२ फलदीपिका (iii) मंगल की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : इस अन्तर्दशा में शुभ फल होते हैं। अशुभ फल तो केवल इतना ही है कि कान में पीड़ा हो और कफ के कारण शरीर में रोग हो। बाकी सब शुभ फल ही हैं। जातक के पुत्र और मित्रों में वृद्धि हो, देवताओं और ब्राह्मणों, की अर्चना हो, सदैव अतिथि पूजा का अवसर मिले। पुण्य कर्मों मे प्रसक्ति हो और तीर्थों में यात्रा हो ॥२३॥ (iv) मंगल की महादशा में शनि की अन्तर्दशा : यह समय बहुत कष्ट कारक होता हैं। जातक के पुत्र, गुरुजन और पुरखों पर एक के बाद एक विपत्ति आती है। जातक स्वयं विपत्तियों का शिकार होता है। शत्रु उसका धन हर लेते हैं। अग्नि और वायु से भय हो--सम्पत्ति आदि चली जावे या पित्त और वात के प्रकोप के कारण शरीरिक रोग हो। जातक के शत्रु उसका धन हर ल। उसकी धन हानि हो और मन को भीतर ही भीतर दुःख पहुचाने वाली घटनायें घटित हों ॥२४॥ (v) मंगल की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : राजा से या सरकार से पीड़ा हो। किसी शूद्र जाति के वैरी के कारण बहुत कष्ट हो। शत्रुओं से भय हो, चोर उपद्रव करे और धन की हानि हो। पशु, हाथी और घोड़ों का नाश हो और शत्रुओं से समागम हो। अब पशु, हाथी या घोड़े तो प्रायः लोग रखते नहीं। तात्पर्य यह है कि ख़राब फल हो ॥२५॥ (vi) मंगल की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : अकस्मात् वज्र से भय हो, अग्नि और शस्त्र से पीड़ा हो, अपने देश से जाना पड़े या धन नाश हो और या तो जातक के स्वयं के प्राण छूट जायें या उसकी स्त्री का नाश हो जाये ॥२६॥ (vii) मंगल की महादशा में शुक्र के अन्तर का फल : युद्ध में पराजय, अपना स्वदेश छोड़ना पड़े और विदेश में जाकर
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६३ रहे। चोर लोग धन चुरा कर ले जायें, बाँये नेत्र में कष्ट हो। नौकरों की हानि हो। अर्थात् जातक को नौकरों को कष्ट हो या नौकरों की संख्या में कमी हो जाये ॥२७॥ (viii) मंगल की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : राजा से सम्मान प्राप्त हो। युद्ध के कारण जातक के प्रभाव में वृद्धि; जातक के नौकरों में, धन में, धान्य में लक्ष्मी में और उसकी स्त्रियों में वृद्धि और विलास हो। अर्थात् इन सब वस्तुओं का अधिकाधिक वैभव और विलास हो। जातक अपने साहस से लक्ष्मी का उपार्जन करे ॥२८॥ (ix) मंगल की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : नाना प्रकार के धनों का आगम हो। पुत्र-प्राप्ति हो, वस्त्र, शय्या, आभूषण, रत्न और सम्पत्ति मिले। शत्रुओं से जुदाई हो अर्थात् शत्रु पीड़ा न रहे। लेकिन किसी गुरुजन को पीड़ा हो और जातक को स्वयं को भी गुल्म और पित्त के कारण कष्ट हो सकता है ॥२९॥ राहु की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल विषाम्बुरुग्दुष्टभुजङ्गदर्शनं पराबलासंयुतिरिष्टविच्युतिः । अरिष्टवाग्दुष्टजनव्यथा भवेद्विधुंतुदेनापहृते स्ववत्सरे ॥३०॥ सुखोपनीतिः सुरविप्रपूजनं विरोगता वामदृशां समागमः । सुपुण्यशास्त्रार्थविचारसम्भवः सुरारिदायान्तरगे बृहस्पतौ ॥३१॥
४६४ फलदीपिका समीरपित्तप्रगदक्षतिस्तनौ तनूजयोषित्सहजैश्च विग्रहः । स्वभृत्यनाशश्च पदच्युतिर्भवेत्- दितिप्रजायुः प्रविशत्यथार्कजे ॥३२॥ सुतस्वसिद्धिः सुहृदां समागमो मनोवनिन्द्यत्वमतीव जायते । पटुक्रियाभूषणकौशलादयो भुजङ्गसंवत्सरहारिणीन्दुजे ॥३३॥ ज्वराग्निशस्त्रारिभयं शिरोरुजा शरीरकम्पः स्वसुहृद्गुरुव्यथा । विषव्रणार्तिः कलहः सुहृज्जनै- रहोन्द्रदाथान्तरगे शिखाधरे ॥३४॥ कलत्रलब्धिः शयनोपचारता तुरङ्गमातङ्गमहीसमागमः । कफानिलाप्तिः स्वजनैर्विरोधिता भवेद्भुजङ्गायुरपाहृतौ भृगोः ॥३५॥ अरिव्यथा स्यादतिपीडनं दृशोर्विषाग्निशस्त्राहतिरापदुद्गमः । वधूसुतार्तिर्नृपतेर्महद्भयं भुजङ्गवर्षे तिमिरारिणा हृते ॥३६॥ वधूविनाशः कलहो मनोरुजा कृषिक्रियावित्तपशुप्रजाक्षयः ।
इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६५ सुहृद्विपत्तिः सलिलाद्भयं भवे- द्विधौ दशाभक्तरि देवविद्विषः ॥३७॥ नृपाग्निचोरास्त्रभयं शरीरिणां शरीरनाशो यदि वा महारुजः । पदभ्रमो हृन्नयनप्रपीडनं यदात्र सर्पायुषि संचरेत्कुजः ॥३८॥ (i) राहु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : विष और जल के कारण रोग हो । जातक को सर्प का दशन हो । दूसरे आदमी की स्त्री से संयोग हो । अपने किसी इष्टजन का वियोग हो । जातक कड़ी बोली बोले । और उसे दुष्टजनों के कारण कष्ट हो ॥३०॥ (ii) राहु की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : सुख की प्राप्ति हो, देवताओं, ब्राह्मणों, का पूजन हो, शरीर में कोई रोग न रहे और सुन्दर नेत्र वाली स्त्रियों से समागम हो । विद्वत्ता के विचार-विनिमय और धार्मिक शास्त्रार्थ में समय व्यतीत हो ॥३१॥ (iii) राहु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : अपनी स्त्री, पुत्रों और भाईयों से झगड़ा हो । जातक की पदच्युति हो और उसके नौकरों का नाश हो । शरीर में चोट लगे तथा वात और पित्त के कारण रोग हो ॥३२॥ (iv) राहु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : धन और पुत्र की प्राप्ति हो, मित्रों से समागम हो, मन में प्रसन्नता हो ।* जातक चातुर्य से कार्य करे । भूषण तथा कुश-
- एक टीकाकार ने यह भी अर्थ किया है कि मन में तुच्छता हो—पर अन्य शुभ फलों का विचार करते हुए यह अर्थ नहीं जँचता ।
४६६ फलदीपिका लता प्राप्त हो । संक्षेप में यह है कि राहु और बुध मित्र हैं और बुध से क्रिया कुशलता, चतुरता व्यापार आदि का विचार किया जाता है । इस कारण राहु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा में बुध से सम्बन्धित कार्यों में शुभता और वृद्धि लाती है ॥३३॥ (v) राहु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : इस अन्तर्दशा में अशुभ फल होता है । ज्वर, अग्नि, शस्त्र और शत्रुओं से भय हो, सिर में रोग हो, शरीर में कम्प हो, जातक को विष और व्रण के कारण कष्ट हो । मित्रों से कलह हो और जातक के मित्रों और गुरु जनों को व्यथा हो ॥३४॥ (vi) राहु की महदशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : स्त्री की प्राप्ति हो । स्त्री-सहवास का सुख हो । हाथी, घोड़े और ज़मीन की प्राप्ति हो या इनका उपभोग प्राप्त हो । किन्तु अपने आदमियों से विरोध हो और जातक को वात और कफ के कारण रोग हो ॥३५॥ (vii) राहु की महादशाँ में सूर्य के अन्तर का फल : शत्रु से पीड़ा हो, अनेक आपत्तियां आवें; विष और अग्नि से पीड़ा हो । शस्त्र से चोट लगे । और जातक के नेत्रों को अति पीड़ा हो । जातक को राजा या सरकार से महान् भय उपस्थित हो और उसकी स्त्री तथा पुत्र को भी कष्ट हो । राहु और सूर्य शत्रु हैं । इस कारण यह अन्तर्दशा इतना अशुभ प्रभाव दिखाती है ॥३६॥ (viii) राहु की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : स्त्री का विनाश हो, लोगों से कलह हो । मन को सन्ताप हो, नोट—जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ एकदूसरे से छठे या आठवें होते हैं या अन्तर्दशानाथ महादशा नाथ से बारहवें होता है तो प्रायः अनिष्ट फल होता है। यदि कोई ग्रह दुःस्थान में बैठा है तो भी कष्ट-कारक होता है। इसी प्रकार अन्तर्दशानाथ और प्रत्यन्तर्दशानाथ का विचार करना चाहिये ।
इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६७ मित्रों पर विपत्ति पड़े । जल से भय हो । कृषि, धन, पशु और सन्तान की हानि हो ॥३७॥ (ix) राहु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : राजा, अग्नि, चोर और अस्त्र से भय हो या तो जातक का शरीर नाश हो जाये या मानस रोग हो । नेत्रों को पीड़ा हो, हृदय रोग (Heart trouble) हो और जातक अपने पद से भ्रष्ट हो जाये । अर्थात् स्थान हानि का भय हो ॥ ३८ ॥ बृहस्पति की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल सौभाग्यकान्तिबहुमानगुणोदयः स्यात्सत्पुत्रसिद्धिरवनीपतिपूजनं च । आचार्यसाधुजनसंयुतिरिष्टसिद्धिः संवत्सरं हरति देवगुरौ स्वकीयम् ॥३६॥ वेश्याङ्गनामदकृदासवदोषसङ्गः उत्कर्षसौख्यसकुटुम्बपशुप्रपीडा । अर्थव्ययोरुभयमक्षिजरुक्सुतार्ति जौवीं दशां विशति दैनकरे नराणाम् ॥४०॥ स्त्रीद्यूतमद्यजमहाव्यसनं त्रिदोषैः केचिद्वदन्त्यपि च केवलमङ्गलाप्तिः । देवद्विजार्चनसुतार्थसुखप्रयोगै- र्गीर्वाणपूजितदशां हरतीन्दुसूनौ ॥४१॥ शस्त्रव्रणं भवति भृत्यजनैर्विरोध- श्चित्तव्यथा तनययोषिदुपद्रवश्च ।
४६८ फलदीपिका प्राणच्युतिर्गुरुसुहृज्जनविप्रयोगः सौरेड्यमायुरपहृत्य ददाति केतुः ॥४२॥ नानाविधार्थपशुधान्यपरिच्छदस्त्री- पुत्रान्नपानशयनाम्बरभूषणाप्तिः । देवद्विजार्चनमुपासनतत्परत्व- मायुर्यदा हरति जैवमथासुरेड्यः ॥४३॥ शत्रोर्जयः क्षितिपमाननकीर्तिलाभः स्याच्चण्डता नरतुरङ्गमवाहनाप्तिः । श्रेण्यग्रहारपुरराष्ट्रसमस्तसंपद् दुच्चैरुचथ्यसहजायुरपाहृतेऽर्के ॥४४॥ योषिद्बहुत्वमरिनाशनमर्थलाभः कृष्यर्थवस्तुपरमोन्नतकीर्तिलाभः । देवद्विजार्चनपरत्वमतीव पुंसां संजायते गुरुदशाहृति शर्वरीशे ॥४५॥ बन्धूपतोषममरिव्रजतोऽर्थलाभः सुक्षेत्रसत्कृतिरिह
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६९ (i) बृहस्पति की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : सौभाग्य की वृद्धि हो, कान्ति बढ़े, सब ओर से मान-सम्मान मिले, पुत्र प्राप्ति हो, जातक के गुणों का उदय और राजदरबार में इज्जत हो। आचार्य और साधु-जनों से संयोग हो। मन की आकांक्षायें पूर्ण हों ॥३९॥ (ii) बृहस्पति की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : वेश्याओं की संगति हो, शराब पीना आदि दोषों की वृद्धि हो, सांसा- रिक स्थिति में उन्नति हो, सुख प्राप्ति हो, किन्तु जातक के कुटुम्ब और पशुओं को पीड़ा हो। धन बहुत अधिक खर्च हो। जातक के हृदय में सदैव भय बना रहे। आँखों में रोग हो और पुत्र को पीड़ा ॥४०॥ (iii) बृहस्पति की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : इस सम्बन्ध में दो मत हैं। एक मत यह है कि बृहस्पति में बुध की अन्तर्दशा अशुभ फल दिखाती है। स्त्रियों से संग हो, शराब पीने का घोर दुर्व्यसन हो और जातक जुआ खेले। वात, पित्त, कफ तीनों दोषों के कारण जातक बीमार पड़े। दूसरा मत यह है कि बृहस्पति की महा- दशा में बुध की अन्तर्दशा केवल शुभ फल देने वाली होती है। और जातक देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन करता है। पुत्र, धन और सुख की प्राप्ति होती है ॥४१॥ (iv) बृहस्पति की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : शस्त्र के व्रण होते हैं। नौकरों से विरोध बढ़ता है। चित्त में व्यथा रहती है, जातक के स्त्री और पुत्रों को कष्ट हो, गुरुजनों अथवा प्रियजनों से वियोग हो और जातक के स्वयं के प्राण जाने का भी कष्ट हो ॥४२॥ (v) बृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : अनेक प्रकार के धन, पशु, अन्न, वस्त्र, स्त्री, पुत्र, भोजन, पीने की वस्तुएँ, आभूषण, शयन-सुख, घर में काम में आने वाली वस्तुएँ प्राप्त
४७० फलदीपिका हों और इन सबसे सुख हो। जातक देवताओं और ब्राह्मणों के अर्चन में तत्पर रहे ॥४३॥ (vi) बृहस्पति की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : शत्रु पर विजय प्राप्त हो, राजा से मान मिले, यश वृद्धि हो, लाभ हो, पालकी और घोड़े की सवारी मिले। जातक के हृदय में पुरुषार्थ बढ़े और जातक किसी बड़े शहर में रहता हुआ समस्त सम्पत्ति का उपभोग करे ॥४४॥ (vii) बृहस्पति की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : बहुत सी स्त्रियों की प्राप्ति हो, धन-लाभ हो, देवता और ब्राह्मणों की पूजा हो, जातक का यश बढ़े, कृषि से लाभ हो, माल के खरीद- फ़रोख़्त में भी नफ़ा हो और शत्रुओं का नाश हो ॥४५॥ (viii) बृहस्पति की महादशा में मंगल की अर्न्तदशा का फल : इस समय जातक के कार्य से बन्धुओं को सन्तोष होता है और जातक को शत्रुओं के संग से लाभ होता है। उत्तम भूमि की प्राप्ति हो, जातक सत्कर्म करे और उसके प्रभाव में वृद्धि हो। जातक के किसी गुरुजन को चोट लगे या उसके स्वयं के नेत्रों में कष्ट हो ॥४६॥ (ix) बृहस्पति की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : बन्धुओं को संताप हो या बन्धुओं से संताप हो। मस्तिष्क में घोर दुश्चिन्तायें और व्यथायें रहें। बीमारी हो, चोर से भय हो। किसी गुरुजन को बीमारी हो या जातक को स्वयं को उदर-विकार हो। राजा से पीड़ा प्राप्त हो। शत्रुओं से कष्ट वृद्धि हो, धन का नाश हो। बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। राहु देवताओं का शत्रु है, इसलिये बृहस्पति में राहु का अशुभ फल होना स्वाभाविक ही है ॥४७॥ शनि को महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल कृषिवृद्धिभृत्यमहिषाभ्युदयः पवनामयो वृषलजातिधनम् ।
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७१ स्थविराङ्गनाप्तिरलसत्वमघो निजवत्सरान्तरगते रविजे ॥४८॥ सुभगत्वमस्ति सुखिता वनिता नृपलालनं विजयमित्रयुतिः । त्रिगदोद्भवः सहजपुत्ररुजा शनिदायहारिणि शशाङ्कसुते ॥४९॥ मरुदग्निपीडनमरि व्यसनं सुतदारविग्रहमतिः सततम् । अशुभावलोकनमहेश्च भयं , मृदुवत्सरं हरति केतुपतौ ॥५०॥ सुहृदङ्गनातनयसौख्ययुतः कृषितोययानजनितार्थचयः । शुभकीर्तिरुद्भवति देहभृतां यमदायहारिणि भृगोस्तनये ॥५१॥ मरणं तु वा रिपुभयं सततं गुरुवर्गरुग्जठरनेत्ररुजा । धनधान्यविच्युतिरिह प्रभवेत्- रविजाय
४७२ फलदीपिका स्वपदच्युतिः स्वजनविग्रहरुक्- ज्वरवह्निशस्त्रविषभीरथ वा । अरिवृद्धिरान्तररुगक्षिभयं रविजायुराविशति भूमिसुते ॥५४॥ अपमार्गयानमसुभिर्विरहस्तु अथ वा प्रमेहगुरुगुल्मभयम् । ज्वररुक्क्षतिः सततमेव नृणा- मसितान्तरं विशति भोगिपतौ ॥५५॥ अमरार्चनद्विजगणाभिरुचि- र्गृहपुत्रदारविहृतिस्तु भवेत् । धनधान्यवृद्धिरधिका हि नृणां गतवत्यार्किवयसोन्द्रगुरौ ॥५६॥ (i) शनि की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : खेती में वृद्धि हो, नौकर और भैंसों की वृद्धि हो अर्थात् जातक अधिक नौकर और भैंसें रखे । वात रोग हो, किसी शूद्र जाति के व्यक्ति से धन का लाभ हो, कुछ अधिक उम्र की स्त्री प्राप्त हो, आलस्य और पाप बढ़े ॥४८॥ (ii) शनि की महादशा में वुध की अन्तर्दशा का फल : सौभाग्य वृद्धि हो, राजा से सत्कार मिले, विजय प्राप्त हो, मित्रों से सौभाग्य हो, स्त्री की प्राप्ति हो और सुख मिले । किन्तु वात, पित्त, कफ, इन तीनों में से किसी एक या अधिक दोषों के कारण रोग हो और जातक के भाई, बहिन या पुत्र को भी बीमारी हो ॥४९॥ (iii) शनि की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : हवा और अग्नि से पीड़ा हो या जातक के शरीर में वायु या गर्मी से
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७३ विकार हो, शत्रुओं से संताप हो, अपनी स्त्री और पुत्र से सदैव झगड़ा रहे । अशुभ बातें देखनी पड़ें और सर्पों से भय हो ॥५०॥ (iv) शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : स्त्री, पुत्रों और मित्रों को सुख हो, खेती और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट के काम से धन संग्रह हो। मूल श्लोक में समुद्र पार से जहाज द्वारा जो वस्तुएँ लाई या ले जाई जाती हैं उनसे लाभ लिखा है। इस अन्तर्दशा में जातक का यश बहुत फैलता है ॥५१॥ (v) शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : जातक की मृत्यु या सदैव शत्रु का भय रहे । गुरुजनों को रोग हो, जातक को स्वयं को उदर-विकार या नेत्र-रोग हो, धन्न और धान्य का नाश हो ॥५२॥ (vi) शनि की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : जातक की स्त्री नष्ट हो या स्वयं की मृत्यु हो, मित्रों पर विपत्ति पड़े, जल और वायु के कारण अति भय हो और जातक को रोग का बहुत भय हो ॥५४॥ (vii) शनि की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : जातक की पदच्युति हो अर्थात् नौकरी छूटे या जिस पद पर वह आरूढ़ हो उस पद से हटाया जाये । अपने आदमियों से झगड़ा हो अथवा रोग, ज्वर, अग्नि, शस्त्र और विष से भय हो । शत्रुओं में वृद्धि हो हर्निया से कष्ट हो या नेत्र रोग हो ॥५४॥ (viii) शनि की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : जातक खराब रास्ते पर जावे, प्राणों का संकट हो । प्रमेह, गुल्म, ज्वर, चोट आदि से पीड़ा हो । शनि और राहु दोनों क्रूर-ग्रह हैं, इस कारण क्रूर-ग्रह की महादशा में क्रूर-ग्रह की अन्तर्दशा पीड़ा- कारक होती है ॥५५॥ (ix) शनि की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : यह अन्तर्दशा शुभ होती है। देवताओं के पूजन और ब्राह्मणों में विशेष
४७४ फलदीपिका रुचि हो। अपनी स्त्री, पुत्र आदि के साथ जातक सुख-पूर्वक अपने घर में रहे। धन और धान्य की अधिकाधिक वृद्धि हो ॥५६॥ बुध की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल धर्ममार्गनिरतिर्विपश्चितां सङ्गमो विमलधीर्धनं द्विजात् । विद्यया बहुयशः सुखं सदा चन्द्रजे हरति वत्सरं स्वकम् ॥५७॥ दुःखशोककलहाकुलात्मता गात्रकम्पनममित्रसंयुतिः । क्षेत्रयानवियुतिर्यदा भवेत्- सोममसूनुशरदं गतः शिखी ॥५८॥ देवविप्रगुरुपूजनक्रिया दानधर्मपरतासमागमः । वस्त्रभूषणसुहृद्युतिर्भवेद्बोधनायुषि समागते सिते ॥५९॥ हेमविद्रुमतुरङ्गवारणप्रावृतं भवनमन्नपानयुक् । भूपतेरपि च पूजनं भवेद्भानुमालिनि बुधाब्दकं गते ॥६०॥ मस्तकव्यसनमक्षिपीडनं कुष्ठदद्रुबहुकण्ठपीडनम् । प्राणसंशययुतिर्नृणां भवेज्ज्ञायुषं व्रजति शीतदीधितौ ॥६१॥ अग्निभीतिरपि नेत्रजा रुजा चोरजं भयमतीव दुःखिता । स्थानहानिरथ वातरोगिता ज्ञायुषं हरति मेदिनीसुते ॥६२॥
॥ -> ॥५७॥ (ii) बुध की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : दुःख, शोक और कलह से मन व्याकुल रहे, जातक का बदन काँपे; शत्रुओं से समागम हो, खेत और सवारी नष्ट हो ॥५८॥ (iii) बुध की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : देवता, ब्राह्मण और गुरुओं का पूजन हो । दान और धर्म में जातक लगा रहे । वस्त्र और भूषणों की प्राप्ति हो । मित्रों से समागम हो ॥५९॥
Everything is checked and aligned accurately with the line markers.इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७५ मानहानिरथवाश्रयच्युतिः स्वक्षयोऽग्निविषतोयजं भयम् । मस्तकाक्षिजठरप्रपीडनं शीतरश्मिजदशां गतेऽसुरे ॥६३॥ व्याधिशत्रु भयविच्युतिर्भवे- द्ृ हासिद्धिरवनीशसत्कृतिः । धर्मसिद्धितपसां समुद्गमो देवमन्त्रिणि विदो दशां गते ॥६
४७६ फलदीपिका (iv) बुध की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : सुवर्ण, मूँगा, घोड़े और हाथियों सहित मकान की प्राप्ति हो, जातक को खाने, पीने का सुख रहे और राजा से सम्मान प्राप्त हो ॥६०॥ (v) बुध की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : सिर में पीड़ा, कण्ठ में बहुत अधिक पीड़ा, नेत्र विकार, कोढ़, दाद आदि की बीमारी का भय होता है। जातक के प्राणों का संशय उपस्थित हो जाता है ॥६१॥ हमारे विचार से दोनों बुध और चन्द्र में मारकत्व होने से ही ऐसा अनिष्टफल होगा अन्यथा नहीं। (vi) बुध की दशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : अग्नि से भय हो, नेत्र रोग हो, चोरी का भय हो, और जातक सदैव दुःखी रहे। जातक की स्थान हानि हो अर्थात् उसका पद या मकान छूट जावे, वात रोग से भी कष्ट होने की संभावना है। यह सब फल बुध की महादशा में जब मंगल की अन्तर्दशा जाती है तब होते हैं ॥६२॥ (vii) बुध की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : मस्तक, नेत्र तथा उदर में पीड़ा हो अपना क्षय हो अर्थात् रोग के कारण जातक का शरीर कमजोर होता चला जाय या जातक के धन का नाश हो। अग्नि, विष और जल से भय हो, जातक की मान हानि हो या जिस पद पर वह कायम हो उस पद से हटाया जाय ॥६३॥ (viii) बुध की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं का नाश हो, रोग से निवृत्ति हो, धार्मिक बातों में सिद्धि प्राप्त हो और राजा से सम्मान मिले। तपस्या और धर्म की ओर विशेष अभिरुचि हो ॥६४॥ (ix) बुध की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : धर्म और अर्थ का नाश हो, सब कार्यों में विफलता मिले, वात और कफ के कारण रोग हों ॥६५॥
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७७ केतु की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल रिपुजनकलहं सुहृद्विरोधं त्वशुभवचः श्रवणं ज्वराङ्गदाहम् । गमनपरधाम्नि वित्तनाशं शिखिनि लभेत दशां गते स्वकीयाम् ॥६६॥ द्विजवरकलहः स्त्रिया विरोधः स्वकुलजनैरपि कन्यकाप्रसूतिः । परिभवजननं परोपतापो भवति सिते शिखिवत्सरान्तराले ॥६७॥ गुरुजनमरणं ज्वरावतारः स्वजनविरोधविदेशयानलाभः । नृपकृतकलहः कफानिलार्ति- र्विशति रवौ शिखिवत्सरान्तरालम् ॥६८॥ सुलभबहुधनं तथैव हानिः सुतविरहो बहुदुःखभाक्प्रसूतिः । परिजनयुवतिप्रजाप्रलाभः शशिनि यदा शिखिदायमभ्युपेते ॥६९॥ स्वकुलजकलहं स्वबन्धुनाशं भयमपि पन्नगजं वदन्ति चोरात् । हुतवहभयशत्रु पीडनं च व्रजति कुजे ध्वजनामखेचरायुः ॥७०॥
४७८ फलदीपिका अरिकृतकलहं नृपाग्निश्चौरै- भयमपि पन्नगजं वदन्ति तज्ज्ञाः । खलजनवचनं दुरिष्टचेष्टा तमसि गतेऽत्र शिखीन्द्रदायमाहुः ॥७१॥ सुतवरजननं सुरेन्द्रपूजा धरणिधनाप्तिरुपायनार्थसिद्धिः । धनचयजननं महीशमानो भवति गतेऽत्र गुरौ शिखीन्द्रदायम् ॥७२॥ परिजनविहतिं परोपतापं रिपुजनविग्रहमङ्गभङ्गतां च धनपदवियुतिं तथाहुराार्या गतवति सूर्यसुते शिखाधरायुः ॥७३॥ सुतवरजननं प्रभुप्रशस्तिः क्षितिधनसिद्धिररीश्वरप्रपीडा । पशुकृषिविहतिर्भवेत्तु पुंसां विशति बुधे शिखिवत्सरान्तरालम् ॥७४॥ (i) केतु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं से कलह हो, मित्रों से विरोध हो, अशुभ वचन सुनने पड़ें, शरीर में बुखार तथा तपिश की बीमारी हो (शरीर के किसी भाग में जलन या दाह) । दूसरे के घर जाना पड़े और धन का नाश हो ॥६६॥ (ii) केतु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : श्रेष्ठ ब्राह्मण से कलह हो, अपनी स्त्री तथा कुल के लोगों से
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७९ विरोध हो, जातक के घर में कन्या का जन्म हो, जातक की मान- हानि हो या उसे नीचा देखना पड़े तथा उसे और लोगों से कष्ट पहुँचे ॥६७॥ (iii) केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : किसी गुरुजन* का मरण हो, अपने आदमियों से विरोध हो, ज्वर से कष्ट हो, राजा या सरकार की ओर से कलह उपस्थित हो, वात या कफ जनित रोग हो, किन्तु विदेश जाने से लाभ हो ॥६८॥ (iv) केतु की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : अचानक बहुत धन का लाभ हो और बहुत धन का नुकसान भी हो, पुत्र से विरह हो, घर में ऐसी प्रसूति (बच्चा पैदा होना) हो जिसके कारण दुःख उठाना पड़े, नौकरों और कन्या-सन्तति का लाभ हो ।.६८।। (v) केतु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : अपने पुरखे लोगों से कलह हो, अपने बन्धुओं का नाश हो, सर्प, चोर और अग्नि से भय हो, शत्रु से पीड़ा हो ॥७०॥ (vi) केतु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं के कारण कलह उपस्थित हो, राजा से, अग्नि से और चोर से भय हो। दुष्ट लोगों की वाणी सुननी पड़े और दूसरे को हानि पहुँचाने वाले कर्म जातक करे ॥७०॥ (vii) केतु की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा का फल : श्रेष्ठ पुत्र की उत्पत्ति हो, देवताओं का पूजन हो, पृथ्वी और धन की प्राप्ति हो अथवा भूमि से धन की प्राप्ति हो, काफी आमदनी *संस्कृत में गुरुजन का अर्थ गुरु या आचार्य ही नहीं होता है। पिता, चाचा, ज्येष्ठ भाई, मामा, ताऊ, मौसा, श्वशुर या गुरु—यह सब गुरुजन के अन्तर्गत आ जाते हैं। माता, दादी, बाबा आदि को भी गुरुजन में ही समझना चाहिये।
४८० फलदीपिका हो, जगह-जगह से भेट मिले। राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त हो । इस अन्तर्दशा का फल उत्तम होगा ॥७२॥ (viii) केतु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : नौकरों की हानि हो, दूसरों से कष्ट मिले, शत्रुओं से झगड़ा हो, जातक का कोई अंग-भंग हो, स्थान, (नौकरी या मकान) छूटे और धन की हानि हो । इस अन्तर्दशा का बहुत अनिष्ट फल है ॥७३॥ (ix) केतु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : उत्तम पुत्र की उत्पत्ति हो, अपने मालिक से प्रशंसा प्राप्त हो, भूमि और धन की प्राप्ति हो किन्तु किसी बड़े शत्रु द्वारा जातक सताया जावे । पशु और खेती का नुकसान हो। इस अन्तर्दशा का मिश्रित फल है ॥७४॥ शुक्र की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल वसनभूषणवाहनचन्दना- द्यनुभवः प्रमदासुखसंपदः । द्युतियुतिः क्षितिपाद्धनलब्धयो भृगुसुते स्वदशां प्रविशत्यपि ॥७५॥ नयनकुक्षिकपोलगदोद्भवः क्षितिभृतो भयमस्ति शरीरिणाम् । गुरुकुलोद्भवबान्धवपीडनं भृगुसुतायुषि भानुमति स्थिते ॥७६॥ नखशिरोरदनक्षतिरुच्चकैः पवनपित्तरुगर्थविनाशनम् ।
इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८१ ग्रहणिगुल्मकयक्ष्मकपीडनं सितवयोहृति तत्र हिमत्विषि ॥७७॥ रुधिरपित्तगदार्तिसमाश्रयः कनकताम्रचयावनिसंग्रहः । युवतिदूषणमुद्यमविच्युति- र्वृषभवल्लभवत्सरगे कुजे ॥७८॥ निधिभवः सुतलब्धिरभीष्टवाक् स्वजनपूजनमप्यरिबन्धनम् । दहनचोरविषोद्भवपीडनं तुलधरेश्वरवत्सरगेऽसुरे ॥७९॥ विविधधर्मसुरेशनमस्क्रिया भवति चात्मजवामहृदागमः । विविधराज्यसुखं च शरीरिणां कविदशाहृति कार्मुकनायके ॥८०॥ नगरयोधनृपोद्भवपूजनं प्रवरयोषिदवाप्तिरथास्ति वा । विविधवित्तपरिच्छदसंयुति- र्दितिपूजितदायगते शनौ ॥८१॥ तनयसौख्यसमागमसम्पदां निचयलब्धिरतिप्रभुता यशः । पवनपित्तकफार्तिररिच्युति र्दनुजमन्त्रिदशाहृति चन्द्रजे ॥८२॥