भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 474

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७३ विकार हो, शत्रुओं से संताप हो, अपनी स्त्री और पुत्र से सदैव झगड़ा रहे । अशुभ बातें देखनी पड़ें और सर्पों से भय हो ॥५०॥ (iv) शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : स्त्री, पुत्रों और मित्रों को सुख हो, खेती और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट के काम से धन संग्रह हो। मूल श्लोक में समुद्र पार से जहाज द्वारा जो वस्तुएँ लाई या ले जाई जाती हैं उनसे लाभ लिखा है। इस अन्तर्दशा में जातक का यश बहुत फैलता है ॥५१॥ (v) शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : जातक की मृत्यु या सदैव शत्रु का भय रहे । गुरुजनों को रोग हो, जातक को स्वयं को उदर-विकार या नेत्र-रोग हो, धन्न और धान्य का नाश हो ॥५२॥ (vi) शनि की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : जातक की स्त्री नष्ट हो या स्वयं की मृत्यु हो, मित्रों पर विपत्ति पड़े, जल और वायु के कारण अति भय हो और जातक को रोग का बहुत भय हो ॥५४॥ (vii) शनि की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : जातक की पदच्युति हो अर्थात् नौकरी छूटे या जिस पद पर वह आरूढ़ हो उस पद से हटाया जाये । अपने आदमियों से झगड़ा हो अथवा रोग, ज्वर, अग्नि, शस्त्र और विष से भय हो । शत्रुओं में वृद्धि हो हर्निया से कष्ट हो या नेत्र रोग हो ॥५४॥ (viii) शनि की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : जातक खराब रास्ते पर जावे, प्राणों का संकट हो । प्रमेह, गुल्म, ज्वर, चोट आदि से पीड़ा हो । शनि और राहु दोनों क्रूर-ग्रह हैं, इस कारण क्रूर-ग्रह की महादशा में क्रूर-ग्रह की अन्तर्दशा पीड़ा- कारक होती है ॥५५॥ (ix) शनि की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : यह अन्तर्दशा शुभ होती है। देवताओं के पूजन और ब्राह्मणों में विशेष