फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ फलदीपिका स्वपदच्युतिः स्वजनविग्रहरुक्- ज्वरवह्निशस्त्रविषभीरथ वा । अरिवृद्धिरान्तररुगक्षिभयं रविजायुराविशति भूमिसुते ॥५४॥ अपमार्गयानमसुभिर्विरहस्तु अथ वा प्रमेहगुरुगुल्मभयम् । ज्वररुक्क्षतिः सततमेव नृणा- मसितान्तरं विशति भोगिपतौ ॥५५॥ अमरार्चनद्विजगणाभिरुचि- र्गृहपुत्रदारविहृतिस्तु भवेत् । धनधान्यवृद्धिरधिका हि नृणां गतवत्यार्किवयसोन्द्रगुरौ ॥५६॥ (i) शनि की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : खेती में वृद्धि हो, नौकर और भैंसों की वृद्धि हो अर्थात् जातक अधिक नौकर और भैंसें रखे । वात रोग हो, किसी शूद्र जाति के व्यक्ति से धन का लाभ हो, कुछ अधिक उम्र की स्त्री प्राप्त हो, आलस्य और पाप बढ़े ॥४८॥ (ii) शनि की महादशा में वुध की अन्तर्दशा का फल : सौभाग्य वृद्धि हो, राजा से सत्कार मिले, विजय प्राप्त हो, मित्रों से सौभाग्य हो, स्त्री की प्राप्ति हो और सुख मिले । किन्तु वात, पित्त, कफ, इन तीनों में से किसी एक या अधिक दोषों के कारण रोग हो और जातक के भाई, बहिन या पुत्र को भी बीमारी हो ॥४९॥ (iii) शनि की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : हवा और अग्नि से पीड़ा हो या जातक के शरीर में वायु या गर्मी से