फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
४८२ फलदीपिका सुतसुखादिबहिः स्थितिरग्निजं भयमतीव विनाशनमङ्गरुक् । अपि च वारवधूजनसंयुतिः शिखिनि यात्यलमौशनसीं दशाम् ॥८३॥ (i) शुक्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : वस्त्र, आभूषण, सवारी, चन्दन आदि खुशबूदार पदार्थ की प्राप्ति हो, स्त्री भोग, सुख और सम्पत्ति मिले। जातक के शरीर में कान्ति की वृद्धि हो । राजा से बहुत धन प्राप्त हो ॥७५॥ (ii) शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : नेत्र, कुक्षि, कपोल इन स्थानों में बीमारी हो। राजा से भय प्राप्त हो अर्थात् राजा की तरफ से कोई टन्टा खड़ा हो । गुरुजन, कुटुम्ब के आदमी अथवा बन्धुओं को पीड़ा हो । इस अन्तर्दशा का फल उत्तम नहीं है ॥७६॥ (iii) शुक्र की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : नख (नाखून), सिर और दाँतों में चोट लगे या पीड़ा हो । वायु और पित्त की बीमारियां हो, धन का नाश हो, संग्रहणी, यक्ष्मा अथवा गुल्म रोग से पीड़ा हो । (गुल्म पेट के अन्दर तिल्ली को कहते हैं ॥७७॥ (iv) शुक्र की महादशा में मगल की अन्तर्दशा का फल : रुधिरदोष तथा पित्त के कारण बीमारियाँ हों । सोना, तांबा और भूमि का संग्रह हो । जिस कार्य में मनुष्य लगा है वह कार्य छोड़ना पड़े। किसी युवती से अनुचित सम्बन्ध हो ॥७८॥
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८३ (v) शुक्र की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : धन की प्राप्ति, पुत्र की उत्पत्ति आदि शुभ फल होते हैं। जातक उत्तम वाणी बोलता है, उसके कुल के लोग उसका आदर करते हैं और जातक अपने शत्रुओं पर विजयी होता है । हो सकता है कि जातक के शत्रु को जेल भी जाना पड़े। किन्तु जातक को स्वयं को भी कुछ कष्ट होता है । जातक को भी विष, अग्नि और चोर से पीड़ा हो ॥७९॥ (vi) शुक्र की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : नाना प्रकार के धर्म के कार्य बन पड़ें। देवताओं का पूजन हो । अपने पुत्र और स्त्रियों से समागम रहे और राज्य में नाना प्रकार के सुख मिलें अर्थात् उत्तम पद और अधिकार के कारण जातक को सुख मिले ॥८०॥ (vii) शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : सरकार से, सेना के लोगों से और नागरिकों से सम्मान प्राप्त हो । उत्तम स्त्री की प्राप्ति हो । नाना प्रकार का धनागम हो और सुख के अन्य उपकरण या साधनों की प्राप्ति हो ॥८१॥ (viii) शुक्र की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : पुत्र सुख हो, सम्पत्तियों का समागम हो; यश, प्रभुता और सुख की प्राप्ति हो । जातक के शत्रुओं का नाश हो किन्तु जातक का स्वयं का वात, पित्त, कफ इन त्रिदोषों में से किसी एक या अधिक दोषों से स्वास्थ्य बिगड़े ॥८२॥ (ix) शुक्र की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : अग्नि से भय हो। शरीर के किसी अंग में पीड़ा हो । सम्पत्ति
४८४ फलदीपिका नष्ट हो, सुख की कमी रहे और वेश्याओं की संगति रहे । पुत्र से विरह हो ॥८३॥ दशापहारेषु फलं यदुक्तं वर्णाधिकारानुगुणं वदन्तु । छिद्रेषु सूक्ष्मेष्वपि तत्फलाप्तिः छायाङ्गवार्ताश्रवणानि वा स्युः ॥८४॥ ऊपर जो दशा अन्तर्दशा का फल कहा गया है; वह जातक की परिस्थिति, वह किस जाति का है, किस पद पर है, क्या कार्य करता है इन सब बातों का विचार कर कहना चाहिये । ऊपर के श्लोकों में केवल महादशा और अन्तर्दशा का फल बताया गया है। इन्हीं सिद्धान्तों को लागू कर प्रत्यन्तर्दशा आदि का फल भी कहना चाहिये अर्थात् “क” ग्रह की महादशा में “ख” ग्रह की जो अन्तर्दशा का फल है वही “क” ग्रह की अन्तर्दशा में “ख” ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा का फल होगा। इसी प्रकार तारतम्य कर प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्म दशा आदि का फल कहे । वराहमिहिर ने लिखा है कि जिस ग्रह की महादशा होती है उस ग्रह की छाया मनुष्य पर विद्यमान होती है और उस मनुष्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है। सूर्य और मंगल का अग्नि तत्व है । चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्व, बुध का पृथ्वी तत्व, बृहस्पति का आकाश तत्व और शनि का वायु तत्व । द्वितीय अध्याय में ग्रहों के पृथक्- पृथक् गुण दिये हैं । जिस ग्रह की महादशा होती है उसके लक्षण जातक में विशेष रहते हैं, उसकी आकृति और वचन भी ग्रह के प्रभाव अनुसार होते हैं। इन सब बातों से भी यह निष्कर्ष निकालना
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८५ चाहिये कि जातक पर किस प्रकार का प्रभाव चल रहा है और तदनुसार ऊहापोह कर फल कहना चाहिये । जिसकी जन्म-कुंडली न हो उसके शरीर की कान्ति, छाया, उसकी चेष्टा, वाणी, क्रिया, व्यवहार आदि से यह पता लगाने की कोशिश करनी चाहिये कि किस ग्रह की महादशा, किसकी अन्तर्दशा, किसकी प्रत्यन्तर्दशा है । किन्तु जिसकी शुद्ध कुंडली सामने हो—उसमें अनुमान की अपेक्षा नहीं है ।
बाईसवां अध्याय मिश्रदशा दस्रादितः पादवशेन मेषान्- मीनांशकान्तं क्रमशोऽपसव्यम् । कीटाद्ध्यान्तं गणयेच्च सव्य- मार्गेण पादक्रमशोऽजतारात् ॥१॥ (i) अश्विनी से तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका इनके १२ चरण हुए । मेष, वृष, मिथुन, कर्क यह अश्विनी के ४ नवांश हुए । सिंह, कन्या, तुला वृश्चिक यह भरणी के चार नवांश हुए । धनु, मकर, कुंभ, मीन यह चार नवांश कृत्तिका के हुए । इस क्रम से १२ नवांशों से इन तीन नक्षत्रों को विभाजित कीजिये । (ii) रोहिणी से तीन नक्षत्र-रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा--इन तीन नक्षत्रों के १२ नवांश हुए। इनको वृश्चिक से उलटा गिनकर—अर्थात् वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष, मेष, मीन, कुंभ, मकर, धनु इन १२ नवांशों में विभाजित कीजिये । रोहिणी प्रथम चरण का वृश्चिक, द्वितीय चरण का तुला.....इस क्रम से आर्द्रा चतुर्थ चरण का धनु नवांश हुआ । एवं भूयाच्चापसव्यं च सव्यं भानि त्रीणि त्रीणि विद्यात्क्रमेण । तद्राशीशप्रोक्तवर्षैर्दशास्य देवं प्राहुः कालचक्रे महान्तः ॥२॥
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४८७ इस प्रकार ऊपर (i) में जो क्रम बताया गया है उस क्रम से पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा को और (ii) में जो क्रम बताया गया है उस क्रम से मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी को; पुनः (i) में जो क्रम बताया गया है उसके अनुसार हस्त, चित्रा, स्वाती को और (ii) में जो क्रम है उस क्रम से, विशाखा, अनुराधा ज्येष्ठा को; फिर (i) वाले क्रम से मूल पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और (ii) वाले क्रम से श्रवण, धनिष्ठा शतमिषा को और (i) वाले क्रम से पूर्वा- भाद्र, उत्तरा भाद्र, रेवती को विभाजित कीजिये : राशि की दशा उतने वर्ष की होती है—जितनी उस राशि के स्वामी की नीचे के श्लोक में बताई गई है ॥२॥ मनुः परः सनिर्धर्निर्नृपस्तपो वने क्रमात् । दिवाकरादिवत्सराः शुभाशुभाप्तिहेतवः ॥३॥ सूर्य के ५ वर्ष (सूर्य की राशि सिंह है—इसलिये सिंह के ५ वर्ष) चन्द्रमा के २१ वर्ष (चन्द्रमा की राशि कर्क है इसलिये कर्क के २१ वर्ष), मंगल की के ७ वर्ष की (मंगल की राशि मेष और वृश्चिक हैं— इस कारण मेष के ७ वर्ष और वृश्चिक के ७ वर्ष), बुध के ९ वर्ष (अर्थात् मिथुन के ९ वर्ष, कन्या के भी ९ वर्ष), बृहस्पति के १० वर्ष (इस कारण धनु के १० वर्ष, मीन के भी १० वर्ष), शुक्र के १६ वर्ष (इसलिये वृष और तुला दोनों के सोलह, सोलह वर्ष) शनि के ४ वर्ष (इसकी दो राशियाँ हैं—मकर और कुंभ इस कारण मकर के ४ वर्ष, कुंभ के भी ४ वर्ष) । अब जिस राशि की दशा हो—उस राशि और राशि के स्वामी के अनुसार कालचक्र दशा का फल कहने का नियम है। इस कारण केवल मेष राशि की दशा, या केवल मंगल की दशा इस कालचक्र दशा में नहीं कहते हैं किन्तु मेष-मंगल की दशा कहते हैं। इसी प्रकार वृश्चिक मंगल की दशा कहते हैं। मेष और
४८८ रुदीपि वृश्चिक दोनों के मालिक मंगल का प्रभाव तो दोनों राशियों की दशा में समान रहेगा किन्तु मान लीजिये मंगल मेष में है—उसमें (मेष में बृहस्पति आदि शुभ ग्रह हैं) और वृश्चिक राशि में शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह हैं तो मेष-मंगल की दशा तो अच्छी जावेगी किन्तु वृश्चिक मंगल की दशा निकृष्ट साबित होगी ॥३॥ दशापहारादिककालचक्रं वाक्यानि दस्रादिपदादिजानि । वक्ष्यामि वर्गैर्नवभिर्भमानै राशीशवर्षैः परमायुरत्र ॥४॥ कालचक्र दशा में किस नक्षत्र चरण में पैदा होने से कौन-कौन सी दशा किस क्रम से आती है,? जिस नक्षत्र चरण में जन्म हो— उसके लिये जिन राशियों की दशा नीचे बताई गई है—उन दशाओं का जोड़ (कुल वर्ष) उस जातक की परमायु होती है। राशियों का क्रम कटपयादि क्रम से बताया गया है। संस्कृत में प्राचीन शैली में अक्षरों से संख्या बताई जाती थी, इसे कटपयादि क्रम कहते हैं :— | १ क | ६ च | १ ट | ६ त | १ प | १ य | ६ ष | | २ ख | ७ छ | २ ठ | ७ थ | २ फ | २ र | ७ स | | ३ ग | ८ ज | ३ ड | ८ द | ३ ब | ३ ल | ८ ह | | ४ घ | ९ झ | ४ ढ | ९ ध | ४ भ | ४ व | ११ क्ष | | ५ ङ | १० ञ | ५ ण | १० न | ५ म | ५ श | १२ त्र |
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ४८९ पौरं गावो मित सन्दिग्धं नक्षत्रेन्दुः स तु भूशूलम् । रूपेत्रक्षन्निधयोरङ्गे वाणौ चस्थं दधि नक्षत्रम् ॥५॥ जिसका अश्विनी के प्रथम चरण में जन्म हो उसको (i) मेष-मंगल (ii) वृषभ-शुक्र (iii) मिथुन-बुध (iv) कर्क-चन्द्र (v) सिंह-सूर्य (vi) कन्या-बुध (vii) तुला-शुक्र (viii) वृश्चिक-मंगल (ix) धनु- बृहस्पति यह नौ दशाये होती हैं । जिसका अश्विनी के द्वितीय चरण में जन्म हो उसकी (i) मकर- शनि (ii) कुंभ-शनि (iii) मीन-बृहस्पति (iv) वृश्चिक-मंगल (v) तुला-शुक्र (vi) कन्या-बुध (vii) कर्क-चन्द्र (viii) सिंह-सूर्य (ix) मिथुन-बुध यह नौ दशायें होती हैं । जिसका अश्विनी नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म हो उसको (i) वृष-शुक्र (ii) मेष-मंगल (iii) मीन-बृहस्पति (iv) कुंभ-शनि (v) मकर-शनि (vi) धनु-बृहस्पति (vii) मेष-मंगल (viii) वृषभ- शुक्र (ix) मिथुन-बुध यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका अश्विनी चतुर्थ चरण में जन्म हो उसको (i) कर्क-चन्द्र (ii) सिंह-सूर्य (iii) कन्या-बुध (iv) तुला-शुक्र (v) वृश्चिक-मंगल (vi) धनु-बृहस्पति (vii) मकर-शनि (viii) कुंभ-शनि (ix) मीन- बृहस्पति-यह नौ दशायें होती हैं । दासतवेशो गौरीपुत्रं क्षन्निधिकारो गोभूशेषम् । सौधिनक्षेत्रेहासन्तो भौमगुरुः पुत्राक्षोनाधिः ॥६॥
४९० फलदीपिका जिसका भरणी के प्रथम चरण में जन्म हो उसको (i) वृश्चिक- मंगल (ii) तुला-शुक्र (iii) कन्या-बुध (iv) कर्क-चन्द्र (v) सिंह- सूर्य (vi) मिथुन-बुध (vii) वृषभ-शुक्र (viii) मेष-मंगल (ix) मीन- बृहस्पति यह नौ दशायें होती हैं । जिसका भरणी नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म हो उसको (i) कुंभ-शनि (ii) मकर-शनि (iii) धनु-बृहस्पति (iv) मेष-मंगल (v) वृषभ-शुक्र (vi) मिथुन-बुध (vii) कर्क-चन्द्र (viii) सिंह-रवि (ix) कन्या-बुध यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका भरणी नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म हो उसे (i) तुला- शुक्र (ii) वृश्चिक-मंगल (iii) धनु-बृहस्पति (iv) मकर-शनि (v) कुंभ-शनि (vi) मीन-बृहस्पति (vii) वृश्चिक-मंगल (viii) तुला-शुक्र (ix) कन्या-बुध यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका भरणी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म हो उसको (i) कर्क चन्द्र (ii) सिंह-रवि (iii) मिथुन-बुध (iv) वृष-शुक्र (v) मेष-मंगल (vi) मीन-बृहस्पति (vii) कुंभ-शनि (viii) मकर-शनि और (ix) धनु बृहस्पति यह नौ दशाएँ होती हैं ॥६॥ वाक्यान्येतान्यश्वियाम्यर्क्षयोर्या- न्यश्विन्याद्यान्यग्निभस्यापसव्ये । सव्येऽजेन्द्रोर्वक्ष्यमाणेषु वाक्ये- ष्ठ्विन्दोर्वाक्यान्येव रौद्रस्य भूयः ॥७॥ अश्विनी और भरणी के पृथक-पृथक चरणों में जन्म होने से जो दशाएँ होती हैं—यह ऊपर के श्लोकों में बताया गया है । जो क्रम अश्विनी के पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे चरणों के लिये बताया गया है वह क्रमशः कृत्तिका के पहिले, दूसरे, तीसरे और चौथे चरणों के
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९१ लिये भी लागू होगा—अश्विनी के प्रथम चरण वाला क्रम कृत्तिका के प्रथम चरण को, अश्विनी के द्वितीय चरण का क्रम कृत्तिका के द्वितीय चरण को इत्यादि । रोहिणी और मृगशिर राशियों के भिन्न-भिन्न चरणों में जन्म होने से क्या दशाक्रम होता है यह नीचे के श्लोकों में बतावेंगे । मृगशिर के चारों चरणों के लिये जो क्रम नीचे बतावेंगे वह क्रमशः आर्द्रा के चारों चरणों को भी लागू होगा । मृगशिर के प्रथम चरण का क्रम आर्द्रा के प्रथम चरण को; मृगशिर के द्वितीय चरण वाला क्रम आर्द्रा के द्वितीय चरण को····इत्यादि ।।७।। धेनुः क्षेत्रे पुरगो शंभु- स्तासां जत्रु क्षन्निधि दासी । चर्मभोगी रायधिनाक्ष- स्त्रीपौराङ्गी शिवतीर्थाब्जे ॥८॥ जिसका रोहिणी के प्रथम चरण में जन्म हो उसको (i) धनु बृहस्पति (ii) मकर-शनि (iii) कुंभ-शनि (vi) मीन-बृहस्पति (v) मेष-मंगल ((vi) वृषभ-शुक्र (vii) मिथुन-बुध (viii) सिंह-सूर्य (ix) कर्क-चन्द्र यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका रोहिणी के द्वितीय चरण में जन्म हो उसे (i) कन्या- बुध (ii) तुला-शुक्र (iii) वृश्चिक-मंगल (iv) मीन-बृहस्पति (v) कुंभ-शनि (vi) मकर-शनि (vii) धनु-बृहस्पति (viii) वृश्चिक-मंगल (ix) तुला-शुक्र यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका रोहिणी तृतीय चरण में जन्म हो उसे (i) कन्या-बुध (ii) सिंह-सूर्य (iii) कर्क-चन्द्र (iv) मिथुन-बुध (v) वृषभ-शुक्र (vi) मेष-मंगल (vii) धनु-बृहस्पति (viii) मकर-शनि (ix) और कुंभ-शनि यह नौ दशाएँ होती हैं।
४९२ फलदीपिका जिसका रोहिणी के चतुर्थ चरण में जन्म हो उसे (i) मीन- बृहस्पति (ii) मेष-मंगल (iii) वृषभ-शुक्र (iv) मिथुन-बुध (v) सिंह- रवि (vi) कर्क-चन्द्र (vii) कन्या-बुध (viii) तुला-शुक्र (ix) वृश्चिक- मंगल यह नौ दशाएँ होती हैं ॥८॥ ऋक्षनिधिर्दा सूचीशंभो गौरयधी नक्षत्रं पारम् । गोशिवतीर्थे दात्रीक्षन्नो धीहसितांशुभोगी रम्या ॥६॥ जिसका मृगशिर नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो उसे (i) मीन- बृहस्पति (ii) कुंभ-शनि (iii) मकर-शनि (iv) धनु-बृहस्पति (v) वृश्चिक-मंगल (vi) तुला-शुक्र (vii) कन्या-बुध (viii) सिंह-सूर्य (ix) कर्क-चन्द्र यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका मृगशिर नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म हो उसे (i) मिथुन-बुध (ii) वृषभ-शुक्र (iii) मेष-मंगल (iv) धनु-बृहस्पति (v) मकर-शनि (vi) कुंभ-शनि (vii) मीन-बृहस्पति (viii) मेष- मंगल (ix) वृष-शुक्र यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका मृगशिर नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म हो उसे (i) मिथुन-बुध (ii) सिंह-सूर्य (iii) कर्क-चन्द्र (iv) कन्या-बुध (v) तुला- शुक्र (vi) वृश्चिक-मंगल (vii) मीन-बृहस्पति (viii) कुंभ-शनि और (ix) मकर-शनि यह नौ दशाएँ होती हैं । जिसका मृगशिर नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म हो उसको (i) धनु-बृहस्पति (ii) वृश्चिक-मंगल (iii) तुला-शुक्र (iv) कन्या- बुध (v) सिंह-सूर्य (vi) कर्क-चन्द्र (vii) मिथुन-बुध (viii) वृषभ- शुक्र और (ix) मेष-मंगल यह नौ दशाएँ होती हैं ।
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ४९३ ऊपर अश्विनी, भरणी, रोहिणी और मृगशिर इन चार नक्षत्रों के (चरण भेद के अनुसार—अर्थात् प्रथम चरण है, द्वितीय चरण है, तृतीय चरण है या चतुर्थ चरण—इसके भेद से) दशाक्रम बताए गये हैं। कुल २७ नक्षत्र हैं। बाकी के २३ नक्षत्रों का (प्रत्येक के चार चरण होते हैं। इसलिये इनके प्रत्येक चरण की) दशाक्रम इन्हीं चार नक्षत्रों के क्रम से है। (i) कृत्तिका, पुनर्वसु, आश्लेषा, हस्त, स्वाती, मूल, उत्तराषाढ़, पूर्वाभाद्र., रेवती इन नक्षत्र चरणों का दशाक्रम अश्विनी नक्षत्र के अनुसार, (ii) पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्र—इन नक्षत्र चरणों का भरणी नक्षत्र के अनुसार, (iii) मघा, विशाखा, श्रवण इन नक्षत्रों का रोहिणी के अनुसार। (iv) आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा इन नक्षत्र चरणों का मृगशिर के नक्षत्र चरणों के अनुसार। नक्षत्रपादैष्यघटी समुत्था पूर्वा दशा तत्पतिवर्षजाता। पूर्वोक्तपादक्रमशोऽत्र विद्यात्- केषांचिदेवं मतमाहुरार्या ॥१०॥ भुक्त, भोग्य दशा निकालने का प्रकार बताते हैं। नक्षत्र चरण के जितने घड़ी, पल बीत गये हैं और नक्षत्र चरण के जितने घड़ी, पल बाकी हैं (यहाँ पूरे नक्षत्र का मान नहीं लिया जाता है—परन्तु नक्षत्र मान का चौथाई लिया जाता है, क्योंकि नक्षत्र के चार चरण होते हैं—चारों चरण बराबर होते हैं) उसी अनुपात से भुक्त-भोग्य--
४९४ फलदीपिका उस राशि का निकालना—जो राशियाँ उस चरण के लिए बताई गई हैं—उनमें से जो सर्वप्रथम हो (उदाहरण के लिये मृगशिर चतुर्थ चरण के लिये जिन राशियों की दशा बताई गई है उनमें सर्वप्रथम धनु-बृहस्पति आई) उसके जितने वर्ष हों, उनको जितने घड़ी, पल नक्षत्रचरण के शेष हों उनसे गुणा करना और नक्षत्र चरण (नक्षत्र के मान का चौथाई) मान से भाग देना तो भोग्य दशा निकल आवेगी। और बाद की दशा—उस नक्षत्र चरण के लिये जिन राशियों की दशा बताई गई हैं—उस क्रम से होगी—ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। ॥ १० ॥ दस्रादिपादप्रभृतीनि भानां वाक्यानि यान्यक्षरपंक्तिजानि । तेषां क्रमेणैव दशा प्रकल्प्या वाक्यक्रमं साध्विति केचिदाहुः ॥११॥ अन्य विद्वानों का (वाक्य-क्रम वालों का) मत है कि उस नक्षत्र चरण के लिये जो पूर्ण दशा १०० वर्ष, या ८५ वर्ष, या ८३ वर्ष, या ८६ वर्ष जैसी जिस चरण की बताई गई है—उस सारी का भुक्त भोग्य (नक्षत्र चरण के जितने घड़ी, पल, बीत गये हैं—और जितने घड़ी पल शेष हैं उसके हिसाब से) निकालना चाहिये। (उदाहरण के लिये अश्विनी के प्रथम चरण का आधा भाग बीत गया है, आधा शेष है तो १०० वर्ष में से ५० बीत गये, ५० शेष रहे) । वाक्यक्रमे कर्क्यलिमीनसन्धौ मण्डूकगत्यश्वरप्लुतिश्च । सिंहावलोकस्त्रिविधा तदानीं दशान्तरं दुःखफलप्रदं स्यात् ॥१२॥
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९५ कर्क राशि की दशा के अन्त में जब अन्य राशि की दशा आती है तब मंडूक गति होती है। वृश्चिक राशि की दशा के बाद जब अन्य राशि की दशा आती है तो उसे तुरग गति कहते हैं। और जब मीन राशि की दशा के बाद अन्य दशा आती है तो इसे सिंहाव- लोकन कहते हैं। यह संधि समय (जब कर्क वृश्चिक या मीन का अन्त हो और बाद की राशि की दशा लगे) दुःख देने वाला होता है। तद्वाक्यवर्णांक्रमशोपहार- वर्षाहिते तत्परमायुराप्ते । तदा दशायामपहारवर्ष- संख्याश्च मासान्दिवसान्वदेयुः ॥१३॥ अब प्रत्येक राशि की दशा में अन्य राशियों की अन्तर्दशा निकालने का प्रकार बताते हैं । अश्विनी प्रथम चरण की दशाएँ हैं—मेष मंगल ७ वर्ष, वृष शुक्र १६ वर्ष आदि। अब मेष मंगल की ७ वर्ष की दशा में—नवों राशि की अन्तर्दशा होवेंगी। जैसे विंशोत्तरी दशा में प्रत्येक ग्रह की महादशा में नौओं ग्रहों की अन्तर्दशा होती है। ∵ अश्विनी प्रथम चरण का कुल महादशा मान १०० वर्ष है। ∴ १०० वर्ष दशामान में वृषभ शुक्र को मिले १६ वर्ष ∴ १ वर्ष दशा में मिलेंगे = १६/१०० वर्ष ∴ ७ वर्ष (मेष-मंगल की दशा में) = १६/१०० × ७/१ = ११२/१०० वर्ष इनके वर्ष, महीने, दिन, हिसाब कर निकाल लीजिये। इन महा-
४९६ फलदीपिका दशा अन्तर्दशाओं को छपी हुई सारिणी भी आती है। वह सारिणी पास में होने से गणित करने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता ॥ १३ ॥ वाक्येषु यावच्छरदां प्रमाणं वदन्ति तावत्परमायुरत्र । मेषादनीकं मदनं गजेन तुन्दः पुनश्चैवमुदीरितं तत् ॥१४॥ इन पिछले श्लोकों में अश्विनी, भरणी, कृतिका के चार चरणों की महादशा का योग क्रमशः १००, ८५, ८३, ८६, वर्ष होता है । वर्ष वर्ष अश्विनी प्रथम चरण १०० रोहिणी प्र० च० ८६ द्वितीय चरण ८५ द्वि० च० ८३ तृतीय चरण ८३ तृ० च० ८५ चतुर्थ चरण ८६ च० च० १०० भरणी प्र० च० १०० मृगशिर प्र० च० ८६ द्वि० च० ८५ द्वि० च० ८३ तृ० च० ८३ तृ० च० ८५ च० च० ८६ च० च० १०० कृत्तिका प्र० च० १०० आद्रा प्र० च० ८६ द्वि० च० ८५ द्वि० च० ८३ तृ० च० ८३ तृ० च० ८५ च० च० ८६ च० च० १०० इसी प्रकार रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा के चार-चार चरणों की महादशा का योग क्रमशः ८६, ८३, ८५, १०० होता है ॥ १४ ॥
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९७ इस प्रकार १४ श्लोकों में मन्त्रेश्वर महाराज ने सारी कालचक्र दशा का गणित, फलित समझा दिया । आज से ४० वर्ष पहले हमने जब कालचक्र दशा का गणित फलित इन श्लोकों से समझने का प्रयत्न किया तो कुछ तो समझ में आया परन्तु पूर्ण रूप से इतना समझ में नहीं आया कि शुद्ध गणित कर उसे जन्म कुंडलियों में लागू कर फलित के सही नतीजे पर पहुँच सकें । तब जातक पारिजात, बृहत्- पाराशर होराशास्त्र आदि का अध्ययन कर विषय (गणित और फलित को) पूर्ण रूप से समझा । इन चालीस वर्षों में अनेक सज्जनों को काल- चक्र दशा का गणित और फलित समझाने के अवसर आये—परन्तु जो सज्जन कठिन विषय को (बुद्धि की कमी के कारण या परिश्रम न करने की प्रवृत्ति—आलस्य के कारण) टालना चाहते हैं—वे इस प्रकरण को टाल गये। अब इस कालचक्र दशा को हम अपने तौर पर स्वतंत्र रूप से समझाते हैं—जिससे ज्योतिष के प्रेमी इससे फलित में लाभ उठा सकें । हमने सैकड़ों ज्योतिषियों से वार्तालाप किया परन्तु यह देख कर खेद हुआ कि जो बड़ी बड़ी जन्मपत्रिकाएँ बनाते हैं और ज्योतिष के विद्वान् समझे जाते हैं उनको भी कालचक्र दशा का ज्ञान नहीं के बराबर है । सौ-दो सौ विद्वान् ज्योतिषियों में कोई एक “कालचक्र दशा” का गणित कर सकता है और इसके आधार पर फलित कह सकता है । दसों हजार कुण्डलियाँ देखने का काम पड़ा परन्तु किसी एक में भी कालचक्र दशा नहीं लगाई गई थी । इसका कारण यह है कि कालचक्र दशा का गणित जितनी व्याख्यापूर्वक समझाया जाना चाहिये था उतनी व्याख्यापूर्वक नहीं समझाया गया । संस्कृत में थोड़े से श्लोकों में सूत्र रूप में निदर्श कर दिया गया है । ऊपर के १४ श्लोकों की हिन्दी-व्याख्या में विषय को समझाने का प्रयत्न किया गया है—परन्तु इन श्लोकों की हिन्दी व्याख्या पढ़ कर विद्वान् तो गणित कर सकेंगे किन्तु साधारण शिक्षितों के दिमाग में इसका गणित का प्रकार पूर्ण रूप से नहीं जम सकेगा—इसलिए अब कालचक्र
४९८ फलदीपिका। दशा के गणित को सारिणियों द्वारा समझाया जाता है। १. किस नक्षत्र चरण की कितनी परमायु होती है यह आगे के पृष्ठ पर सारिणी 'क' में देखिये । २. प्रत्येक नक्षत्र चरण (आजकल नवीन गणितज्ञ रैफिल या लहरी के पंचांगों को विशेष काम में लाते हैं) जिनमें स्पष्ट चन्द्र लाघवार्थ (लोगेरिथम) से करने की पद्धति दी रहती है। इस कारण नक्षत्र चरणों के साथ-साथ सारिणी 'ख' में स्पष्ट चन्द्र भी ब्रैकेट के अन्दर दे दिये गये हैं। सारिणी 'ख' में यह बताया गया है कि किस नक्षत्र चरण में किन-किन राशियों की दशा होती है । (३) सारिणी 'क' में नक्षत्र (कोष्ठ क, ग, ङ, छ, झ में) ऊपर से नीचे प्र० च०, द्वि० च०, तृ० च०, च० च० इस क्रम से दिये गये हैं। उनकी राशियों की महादशा (सारिणी 'ख') में जो राशि सर्वप्रथम हो वह 'देह' और जो राशि सबके अन्त में आवे वह 'जीव' कहलाती है। 'देह' राशि का स्वामी 'देहाधिप' और 'जीव' राशि का स्वामी 'जीवाधिप' कहलाता है । ४. सारिणी 'क' में जो नक्षत्र (कोष्ठ ख, घ, च, ज) में नीचे से ऊपर (च० च०, तृ० च०, द्वि० च०, प्र० च०) इस क्रम से दिये गये हैं उनकी राशियों की महादशा (सारिणी 'ख' में) जो राशि सर्वप्रथम हो वह 'जीव' और उस राशि का स्वामी 'जीवाधिप' और जो राशि सबसे अन्त में हो, वह 'देह' और उसका स्वामी 'देहाधिप' कहलाता है। इन 'जीव' और 'देह' राशियों की आगे फलित में आवश्यकता पड़ेगी इसलिये ध्यान में रखना चाहिये । *स्पष्ट चन्द्र से भुक्त, भोग्य, महादशा निकालने की सारिणियां पुस्तक के अन्त में दी गई हैं।
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९९
'सारिणी_क' (पृ० ४६६-५०१)
| नक्षत्र चरण (क) | नक्षत्र चरण (ख) | नक्षत्र चरण (ग) | पूर्ण आयु वर्ष | देहाधिप | जीवाधिप |
|---|---|---|---|---|---|
| १. अ० प्र० | २४. आर्द्रा च० | २५. पुन० प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| २. ” द्वि० | २३. ” त० | २६. ” द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ३. ” तृ० | २२. ” द्वि० | २७. ” तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ४. ” च० | २१. आर्द्रा प्र० | २८. ” च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ५. भ० प्र० | २०. मृ० च० | २९. पुष्य प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ६. ” द्वि० | १९. ” त० | ३०. ” द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ७. ” तृ० | १८. ” द्वि० | ३१. ” तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ८. ” च० | १७. मृ० प्र० |
५०० | फलदीपिका
| नक्षत्र चरण (घ) | नक्षत्र चरण (ङ) | नक्षत्र चरण (च) | पूर्ण आयु वर्ष | देहाधिप | जीवाधिप |
|---|---|---|---|---|---|
| ४८. उ. फा. चं० | ४९. ह० प्र० | ७२. ज्ये० चं० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ४७. ,, तृ० | ५०. ,, द्वि० | ७१. ,, तृ० | ८५ | शनि | बुध |
| ४६. ,, द्वि० | ५१. ,, तृ० | ७०. ,, द्वि० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ४५. उ. फा. प्र० | ५२. ,, चं० | ६९. ज्ये० प्र० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ४४. पू. फा. चं० | ५३. चि० प्र० | ६८. अनु० चं० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ४३. ,, तृ० | ५४. ,, द्वि० | ६७. ,, प्र० | ८५ | शनि | बुध |
| ४२. ,, द्वि० | ५५. ,, तृ० | ६६. ,, द्वि० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ४१. पू. फा. प्र० | ५६. ,, चं० | ६५. अनु० प्र० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ४०. मघा चं० | ५७. स्वा० प्र० | ६४. वि० चं० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ३९. ,, तृ० | ५८. ,, द्वि० | ६३. ,, तृ० | ८५ | शनि | बुध |
| ३८. ,, द्वि० | ५९. ,, तृ० | ६२. ,, द्वि० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ३७. मघा प्र० | ६०. ,, चं० | ६१. वि० प्र० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०१
| नक्षत्र चरण (छ) | नक्षत्र चरण (ज) | नक्षत्र चरण (झ) | पूर्ण आयु वर्ष | देहाधिप | जीवाधिप |
|---|---|---|---|---|---|
| ७३. मू० प्र० | ९६. शत० च० | ९७. पू. भा. प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ७४. " द्वि० | ९५. " तृ० | ९८. " द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ७५. " तृ० | ९४. " द्वि० | ९९. " तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ७६. " च० | ९३. शत० प्र० | १००. " च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ७७. पू. षा. प्र० | ९२. धनि० च० | १०१. उ. भा. प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ७८. " द्वि० | ९१. " तृ० | १०२. " द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ७९. " तृ० | ९०. " द्वि० | १०३. " तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ८०. " च० | ८९. धनि० प्र० | १०४. " च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ८१. उ. षा. प्र० | ८८. श्रव० च० | १०५. रेव० प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ८२. " द्वि० | ८७. " तृ० | १०६. " द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ८३. " तृ० | ८६. " द्वि० | १०७. " तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ८४. " च० | ८५. श्रव० प्र० | १०८. " च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |