फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 489, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें४८८ रुदीपि वृश्चिक दोनों के मालिक मंगल का प्रभाव तो दोनों राशियों की दशा में समान रहेगा किन्तु मान लीजिये मंगल मेष में है—उसमें (मेष में बृहस्पति आदि शुभ ग्रह हैं) और वृश्चिक राशि में शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह हैं तो मेष-मंगल की दशा तो अच्छी जावेगी किन्तु वृश्चिक मंगल की दशा निकृष्ट साबित होगी ॥३॥ दशापहारादिककालचक्रं वाक्यानि दस्रादिपदादिजानि । वक्ष्यामि वर्गैर्नवभिर्भमानै राशीशवर्षैः परमायुरत्र ॥४॥ कालचक्र दशा में किस नक्षत्र चरण में पैदा होने से कौन-कौन सी दशा किस क्रम से आती है,? जिस नक्षत्र चरण में जन्म हो— उसके लिये जिन राशियों की दशा नीचे बताई गई है—उन दशाओं का जोड़ (कुल वर्ष) उस जातक की परमायु होती है। राशियों का क्रम कटपयादि क्रम से बताया गया है। संस्कृत में प्राचीन शैली में अक्षरों से संख्या बताई जाती थी, इसे कटपयादि क्रम कहते हैं :— | १ क | ६ च | १ ट | ६ त | १ प | १ य | ६ ष | | २ ख | ७ छ | २ ठ | ७ थ | २ फ | २ र | ७ स | | ३ ग | ८ ज | ३ ड | ८ द | ३ ब | ३ ल | ८ ह | | ४ घ | ९ झ | ४ ढ | ९ ध | ४ भ | ४ व | ११ क्ष | | ५ ङ | १० ञ | ५ ण | १० न | ५ म | ५ श | १२ त्र |