फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८३ (v) शुक्र की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : धन की प्राप्ति, पुत्र की उत्पत्ति आदि शुभ फल होते हैं। जातक उत्तम वाणी बोलता है, उसके कुल के लोग उसका आदर करते हैं और जातक अपने शत्रुओं पर विजयी होता है । हो सकता है कि जातक के शत्रु को जेल भी जाना पड़े। किन्तु जातक को स्वयं को भी कुछ कष्ट होता है । जातक को भी विष, अग्नि और चोर से पीड़ा हो ॥७९॥ (vi) शुक्र की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : नाना प्रकार के धर्म के कार्य बन पड़ें। देवताओं का पूजन हो । अपने पुत्र और स्त्रियों से समागम रहे और राज्य में नाना प्रकार के सुख मिलें अर्थात् उत्तम पद और अधिकार के कारण जातक को सुख मिले ॥८०॥ (vii) शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : सरकार से, सेना के लोगों से और नागरिकों से सम्मान प्राप्त हो । उत्तम स्त्री की प्राप्ति हो । नाना प्रकार का धनागम हो और सुख के अन्य उपकरण या साधनों की प्राप्ति हो ॥८१॥ (viii) शुक्र की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : पुत्र सुख हो, सम्पत्तियों का समागम हो; यश, प्रभुता और सुख की प्राप्ति हो । जातक के शत्रुओं का नाश हो किन्तु जातक का स्वयं का वात, पित्त, कफ इन त्रिदोषों में से किसी एक या अधिक दोषों से स्वास्थ्य बिगड़े ॥८२॥ (ix) शुक्र की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : अग्नि से भय हो। शरीर के किसी अंग में पीड़ा हो । सम्पत्ति