फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ फलदीपिका नष्ट हो, सुख की कमी रहे और वेश्याओं की संगति रहे । पुत्र से विरह हो ॥८३॥ दशापहारेषु फलं यदुक्तं वर्णाधिकारानुगुणं वदन्तु । छिद्रेषु सूक्ष्मेष्वपि तत्फलाप्तिः छायाङ्गवार्ताश्रवणानि वा स्युः ॥८४॥ ऊपर जो दशा अन्तर्दशा का फल कहा गया है; वह जातक की परिस्थिति, वह किस जाति का है, किस पद पर है, क्या कार्य करता है इन सब बातों का विचार कर कहना चाहिये । ऊपर के श्लोकों में केवल महादशा और अन्तर्दशा का फल बताया गया है। इन्हीं सिद्धान्तों को लागू कर प्रत्यन्तर्दशा आदि का फल भी कहना चाहिये अर्थात् “क” ग्रह की महादशा में “ख” ग्रह की जो अन्तर्दशा का फल है वही “क” ग्रह की अन्तर्दशा में “ख” ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा का फल होगा। इसी प्रकार तारतम्य कर प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्म दशा आदि का फल कहे । वराहमिहिर ने लिखा है कि जिस ग्रह की महादशा होती है उस ग्रह की छाया मनुष्य पर विद्यमान होती है और उस मनुष्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है। सूर्य और मंगल का अग्नि तत्व है । चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्व, बुध का पृथ्वी तत्व, बृहस्पति का आकाश तत्व और शनि का वायु तत्व । द्वितीय अध्याय में ग्रहों के पृथक्- पृथक् गुण दिये हैं । जिस ग्रह की महादशा होती है उसके लक्षण जातक में विशेष रहते हैं, उसकी आकृति और वचन भी ग्रह के प्रभाव अनुसार होते हैं। इन सब बातों से भी यह निष्कर्ष निकालना