फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८२ फलदीपिका सुतसुखादिबहिः स्थितिरग्निजं भयमतीव विनाशनमङ्गरुक् । अपि च वारवधूजनसंयुतिः शिखिनि यात्यलमौशनसीं दशाम् ॥८३॥ (i) शुक्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : वस्त्र, आभूषण, सवारी, चन्दन आदि खुशबूदार पदार्थ की प्राप्ति हो, स्त्री भोग, सुख और सम्पत्ति मिले। जातक के शरीर में कान्ति की वृद्धि हो । राजा से बहुत धन प्राप्त हो ॥७५॥ (ii) शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : नेत्र, कुक्षि, कपोल इन स्थानों में बीमारी हो। राजा से भय प्राप्त हो अर्थात् राजा की तरफ से कोई टन्टा खड़ा हो । गुरुजन, कुटुम्ब के आदमी अथवा बन्धुओं को पीड़ा हो । इस अन्तर्दशा का फल उत्तम नहीं है ॥७६॥ (iii) शुक्र की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : नख (नाखून), सिर और दाँतों में चोट लगे या पीड़ा हो । वायु और पित्त की बीमारियां हो, धन का नाश हो, संग्रहणी, यक्ष्मा अथवा गुल्म रोग से पीड़ा हो । (गुल्म पेट के अन्दर तिल्ली को कहते हैं ॥७७॥ (iv) शुक्र की महादशा में मगल की अन्तर्दशा का फल : रुधिरदोष तथा पित्त के कारण बीमारियाँ हों । सोना, तांबा और भूमि का संग्रह हो । जिस कार्य में मनुष्य लगा है वह कार्य छोड़ना पड़े। किसी युवती से अनुचित सम्बन्ध हो ॥७८॥