भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ४९३ ऊपर अश्विनी, भरणी, रोहिणी और मृगशिर इन चार नक्षत्रों के (चरण भेद के अनुसार—अर्थात् प्रथम चरण है, द्वितीय चरण है, तृतीय चरण है या चतुर्थ चरण—इसके भेद से) दशाक्रम बताए गये हैं। कुल २७ नक्षत्र हैं। बाकी के २३ नक्षत्रों का (प्रत्येक के चार चरण होते हैं। इसलिये इनके प्रत्येक चरण की) दशाक्रम इन्हीं चार नक्षत्रों के क्रम से है। (i) कृत्तिका, पुनर्वसु, आश्लेषा, हस्त, स्वाती, मूल, उत्तराषाढ़, पूर्वाभाद्र., रेवती इन नक्षत्र चरणों का दशाक्रम अश्विनी नक्षत्र के अनुसार, (ii) पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्र—इन नक्षत्र चरणों का भरणी नक्षत्र के अनुसार, (iii) मघा, विशाखा, श्रवण इन नक्षत्रों का रोहिणी के अनुसार। (iv) आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा इन नक्षत्र चरणों का मृगशिर के नक्षत्र चरणों के अनुसार। नक्षत्रपादैष्यघटी समुत्था पूर्वा दशा तत्पतिवर्षजाता। पूर्वोक्तपादक्रमशोऽत्र विद्यात्- केषांचिदेवं मतमाहुरार्या ॥१०॥ भुक्त, भोग्य दशा निकालने का प्रकार बताते हैं। नक्षत्र चरण के जितने घड़ी, पल बीत गये हैं और नक्षत्र चरण के जितने घड़ी, पल बाकी हैं (यहाँ पूरे नक्षत्र का मान नहीं लिया जाता है—परन्तु नक्षत्र मान का चौथाई लिया जाता है, क्योंकि नक्षत्र के चार चरण होते हैं—चारों चरण बराबर होते हैं) उसी अनुपात से भुक्त-भोग्य--