भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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४९४ फलदीपिका उस राशि का निकालना—जो राशियाँ उस चरण के लिए बताई गई हैं—उनमें से जो सर्वप्रथम हो (उदाहरण के लिये मृगशिर चतुर्थ चरण के लिये जिन राशियों की दशा बताई गई है उनमें सर्वप्रथम धनु-बृहस्पति आई) उसके जितने वर्ष हों, उनको जितने घड़ी, पल नक्षत्रचरण के शेष हों उनसे गुणा करना और नक्षत्र चरण (नक्षत्र के मान का चौथाई) मान से भाग देना तो भोग्य दशा निकल आवेगी। और बाद की दशा—उस नक्षत्र चरण के लिये जिन राशियों की दशा बताई गई हैं—उस क्रम से होगी—ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। ॥ १० ॥ दस्रादिपादप्रभृतीनि भानां वाक्यानि यान्यक्षरपंक्तिजानि । तेषां क्रमेणैव दशा प्रकल्प्या वाक्यक्रमं साध्विति केचिदाहुः ॥११॥ अन्य विद्वानों का (वाक्य-क्रम वालों का) मत है कि उस नक्षत्र चरण के लिये जो पूर्ण दशा १०० वर्ष, या ८५ वर्ष, या ८३ वर्ष, या ८६ वर्ष जैसी जिस चरण की बताई गई है—उस सारी का भुक्त भोग्य (नक्षत्र चरण के जितने घड़ी, पल, बीत गये हैं—और जितने घड़ी पल शेष हैं उसके हिसाब से) निकालना चाहिये। (उदाहरण के लिये अश्विनी के प्रथम चरण का आधा भाग बीत गया है, आधा शेष है तो १०० वर्ष में से ५० बीत गये, ५० शेष रहे) । वाक्यक्रमे कर्क्यलिमीनसन्धौ मण्डूकगत्यश्वरप्लुतिश्च । सिंहावलोकस्त्रिविधा तदानीं दशान्तरं दुःखफलप्रदं स्यात् ॥१२॥