भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९५ कर्क राशि की दशा के अन्त में जब अन्य राशि की दशा आती है तब मंडूक गति होती है। वृश्चिक राशि की दशा के बाद जब अन्य राशि की दशा आती है तो उसे तुरग गति कहते हैं। और जब मीन राशि की दशा के बाद अन्य दशा आती है तो इसे सिंहाव- लोकन कहते हैं। यह संधि समय (जब कर्क वृश्चिक या मीन का अन्त हो और बाद की राशि की दशा लगे) दुःख देने वाला होता है। तद्वाक्यवर्णांक्रमशोपहार- वर्षाहिते तत्परमायुराप्ते । तदा दशायामपहारवर्ष- संख्याश्च मासान्दिवसान्वदेयुः ॥१३॥ अब प्रत्येक राशि की दशा में अन्य राशियों की अन्तर्दशा निकालने का प्रकार बताते हैं । अश्विनी प्रथम चरण की दशाएँ हैं—मेष मंगल ७ वर्ष, वृष शुक्र १६ वर्ष आदि। अब मेष मंगल की ७ वर्ष की दशा में—नवों राशि की अन्तर्दशा होवेंगी। जैसे विंशोत्तरी दशा में प्रत्येक ग्रह की महादशा में नौओं ग्रहों की अन्तर्दशा होती है। ∵ अश्विनी प्रथम चरण का कुल महादशा मान १०० वर्ष है। ∴ १०० वर्ष दशामान में वृषभ शुक्र को मिले १६ वर्ष ∴ १ वर्ष दशा में मिलेंगे = १६/१०० वर्ष ∴ ७ वर्ष (मेष-मंगल की दशा में) = १६/१०० × ७/१ = ११२/१०० वर्ष इनके वर्ष, महीने, दिन, हिसाब कर निकाल लीजिये। इन महा-