भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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४९६ फलदीपिका दशा अन्तर्दशाओं को छपी हुई सारिणी भी आती है। वह सारिणी पास में होने से गणित करने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता ॥ १३ ॥ वाक्येषु यावच्छरदां प्रमाणं वदन्ति तावत्परमायुरत्र । मेषादनीकं मदनं गजेन तुन्दः पुनश्चैवमुदीरितं तत् ॥१४॥ इन पिछले श्लोकों में अश्विनी, भरणी, कृतिका के चार चरणों की महादशा का योग क्रमशः १००, ८५, ८३, ८६, वर्ष होता है । वर्ष वर्ष अश्विनी प्रथम चरण १०० रोहिणी प्र० च० ८६ द्वितीय चरण ८५ द्वि० च० ८३ तृतीय चरण ८३ तृ० च० ८५ चतुर्थ चरण ८६ च० च० १०० भरणी प्र० च० १०० मृगशिर प्र० च० ८६ द्वि० च० ८५ द्वि० च० ८३ तृ० च० ८३ तृ० च० ८५ च० च० ८६ च० च० १०० कृत्तिका प्र० च० १०० आद्रा प्र० च० ८६ द्वि० च० ८५ द्वि० च० ८३ तृ० च० ८३ तृ० च० ८५ च० च० ८६ च० च० १०० इसी प्रकार रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा के चार-चार चरणों की महादशा का योग क्रमशः ८६, ८३, ८५, १०० होता है ॥ १४ ॥