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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

४९६ फलदीपिका दशा अन्तर्दशाओं को छपी हुई सारिणी भी आती है। वह सारिणी पास में होने से गणित करने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता ॥ १३ ॥ वाक्येषु यावच्छरदां प्रमाणं वदन्ति तावत्परमायुरत्र । मेषादनीकं मदनं गजेन तुन्दः पुनश्चैवमुदीरितं तत् ॥१४॥ इन पिछले श्लोकों में अश्विनी, भरणी, कृतिका के चार चरणों की महादशा का योग क्रमशः १००, ८५, ८३, ८६, वर्ष होता है । वर्ष वर्ष अश्विनी प्रथम चरण १०० रोहिणी प्र० च० ८६ द्वितीय चरण ८५ द्वि० च० ८३ तृतीय चरण ८३ तृ० च० ८५ चतुर्थ चरण ८६ च० च० १०० भरणी प्र० च० १०० मृगशिर प्र० च० ८६ द्वि० च० ८५ द्वि० च० ८३ तृ० च० ८३ तृ० च० ८५ च० च० ८६ च० च० १०० कृत्तिका प्र० च० १०० आद्रा प्र० च० ८६ द्वि० च० ८५ द्वि० च० ८३ तृ० च० ८३ तृ० च० ८५ च० च० ८६ च० च० १०० इसी प्रकार रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा के चार-चार चरणों की महादशा का योग क्रमशः ८६, ८३, ८५, १०० होता है ॥ १४ ॥

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९७ इस प्रकार १४ श्लोकों में मन्त्रेश्वर महाराज ने सारी कालचक्र दशा का गणित, फलित समझा दिया । आज से ४० वर्ष पहले हमने जब कालचक्र दशा का गणित फलित इन श्लोकों से समझने का प्रयत्न किया तो कुछ तो समझ में आया परन्तु पूर्ण रूप से इतना समझ में नहीं आया कि शुद्ध गणित कर उसे जन्म कुंडलियों में लागू कर फलित के सही नतीजे पर पहुँच सकें । तब जातक पारिजात, बृहत्- पाराशर होराशास्त्र आदि का अध्ययन कर विषय (गणित और फलित को) पूर्ण रूप से समझा । इन चालीस वर्षों में अनेक सज्जनों को काल- चक्र दशा का गणित और फलित समझाने के अवसर आये—परन्तु जो सज्जन कठिन विषय को (बुद्धि की कमी के कारण या परिश्रम न करने की प्रवृत्ति—आलस्य के कारण) टालना चाहते हैं—वे इस प्रकरण को टाल गये। अब इस कालचक्र दशा को हम अपने तौर पर स्वतंत्र रूप से समझाते हैं—जिससे ज्योतिष के प्रेमी इससे फलित में लाभ उठा सकें । हमने सैकड़ों ज्योतिषियों से वार्तालाप किया परन्तु यह देख कर खेद हुआ कि जो बड़ी बड़ी जन्मपत्रिकाएँ बनाते हैं और ज्योतिष के विद्वान् समझे जाते हैं उनको भी कालचक्र दशा का ज्ञान नहीं के बराबर है । सौ-दो सौ विद्वान् ज्योतिषियों में कोई एक “कालचक्र दशा” का गणित कर सकता है और इसके आधार पर फलित कह सकता है । दसों हजार कुण्डलियाँ देखने का काम पड़ा परन्तु किसी एक में भी कालचक्र दशा नहीं लगाई गई थी । इसका कारण यह है कि कालचक्र दशा का गणित जितनी व्याख्यापूर्वक समझाया जाना चाहिये था उतनी व्याख्यापूर्वक नहीं समझाया गया । संस्कृत में थोड़े से श्लोकों में सूत्र रूप में निदर्श कर दिया गया है । ऊपर के १४ श्लोकों की हिन्दी-व्याख्या में विषय को समझाने का प्रयत्न किया गया है—परन्तु इन श्लोकों की हिन्दी व्याख्या पढ़ कर विद्वान् तो गणित कर सकेंगे किन्तु साधारण शिक्षितों के दिमाग में इसका गणित का प्रकार पूर्ण रूप से नहीं जम सकेगा—इसलिए अब कालचक्र

४९८ फलदीपिका। दशा के गणित को सारिणियों द्वारा समझाया जाता है। १. किस नक्षत्र चरण की कितनी परमायु होती है यह आगे के पृष्ठ पर सारिणी 'क' में देखिये । २. प्रत्येक नक्षत्र चरण (आजकल नवीन गणितज्ञ रैफिल या लहरी के पंचांगों को विशेष काम में लाते हैं) जिनमें स्पष्ट चन्द्र लाघवार्थ (लोगेरिथम) से करने की पद्धति दी रहती है। इस कारण नक्षत्र चरणों के साथ-साथ सारिणी 'ख' में स्पष्ट चन्द्र भी ब्रैकेट के अन्दर दे दिये गये हैं। सारिणी 'ख' में यह बताया गया है कि किस नक्षत्र चरण में किन-किन राशियों की दशा होती है । (३) सारिणी 'क' में नक्षत्र (कोष्ठ क, ग, ङ, छ, झ में) ऊपर से नीचे प्र० च०, द्वि० च०, तृ० च०, च० च० इस क्रम से दिये गये हैं। उनकी राशियों की महादशा (सारिणी 'ख') में जो राशि सर्वप्रथम हो वह 'देह' और जो राशि सबके अन्त में आवे वह 'जीव' कहलाती है। 'देह' राशि का स्वामी 'देहाधिप' और 'जीव' राशि का स्वामी 'जीवाधिप' कहलाता है । ४. सारिणी 'क' में जो नक्षत्र (कोष्ठ ख, घ, च, ज) में नीचे से ऊपर (च० च०, तृ० च०, द्वि० च०, प्र० च०) इस क्रम से दिये गये हैं उनकी राशियों की महादशा (सारिणी 'ख' में) जो राशि सर्वप्रथम हो वह 'जीव' और उस राशि का स्वामी 'जीवाधिप' और जो राशि सबसे अन्त में हो, वह 'देह' और उसका स्वामी 'देहाधिप' कहलाता है। इन 'जीव' और 'देह' राशियों की आगे फलित में आवश्यकता पड़ेगी इसलिये ध्यान में रखना चाहिये । *स्पष्ट चन्द्र से भुक्त, भोग्य, महादशा निकालने की सारिणियां पुस्तक के अन्त में दी गई हैं।

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४९९

'सारिणी_क' (पृ० ४६६-५०१)

नक्षत्र चरण (क)नक्षत्र चरण (ख)नक्षत्र चरण (ग)पूर्ण आयु वर्षदेहाधिपजीवाधिप
१. अ० प्र०२४. आर्द्रा च०२५. पुन० प्र०१००मंगलबृहस्पति
२. ” द्वि०२३. ” त०२६. ” द्वि०८५शनिबुध
३. ” तृ०२२. ” द्वि०२७. ” तृ०८३शुक्रबुध
४. ” च०२१. आर्द्रा प्र०२८. ” च०८६चन्द्रबृहस्पति
५. भ० प्र०२०. मृ० च०२९. पुष्य प्र०१००मंगलबृहस्पति
६. ” द्वि०१९. ” त०३०. ” द्वि०८५शनिबुध
७. ” तृ०१८. ” द्वि०३१. ” तृ०८३शुक्रबुध
८. ” च०१७. मृ० प्र०

५०० | फलदीपिका

नक्षत्र चरण (घ)नक्षत्र चरण (ङ)नक्षत्र चरण (च)पूर्ण आयु वर्षदेहाधिपजीवाधिप
४८. उ. फा. चं०४९. ह० प्र०७२. ज्ये० चं०१००मंगलबृहस्पति
४७. ,, तृ०५०. ,, द्वि०७१. ,, तृ०८५शनिबुध
४६. ,, द्वि०५१. ,, तृ०७०. ,, द्वि०८३शुक्रबुध
४५. उ. फा. प्र०५२. ,, चं०६९. ज्ये० प्र०८६चन्द्रबृहस्पति
४४. पू. फा. चं०५३. चि० प्र०६८. अनु० चं०१००मंगलबृहस्पति
४३. ,, तृ०५४. ,, द्वि०६७. ,, प्र०८५शनिबुध
४२. ,, द्वि०५५. ,, तृ०६६. ,, द्वि०८३शुक्रबुध
४१. पू. फा. प्र०५६. ,, चं०६५. अनु० प्र०८६चन्द्रबृहस्पति
४०. मघा चं०५७. स्वा० प्र०६४. वि० चं०१००मंगलबृहस्पति
३९. ,, तृ०५८. ,, द्वि०६३. ,, तृ०८५शनिबुध
३८. ,, द्वि०५९. ,, तृ०६२. ,, द्वि०८३शुक्रबुध
३७. मघा प्र०६०. ,, चं०६१. वि० प्र०८६चन्द्रबृहस्पति

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०१

नक्षत्र चरण (छ)नक्षत्र चरण (ज)नक्षत्र चरण (झ)पूर्ण आयु वर्षदेहाधिपजीवाधिप
७३. मू० प्र०९६. शत० च०९७. पू. भा. प्र०१००मंगलबृहस्पति
७४. " द्वि०९५. " तृ०९८. " द्वि०८५शनिबुध
७५. " तृ०९४. " द्वि०९९. " तृ०८३शुक्रबुध
७६. " च०९३. शत० प्र०१००. " च०८६चन्द्रबृहस्पति
७७. पू. षा. प्र०९२. धनि० च०१०१. उ. भा. प्र०१००मंगलबृहस्पति
७८. " द्वि०९१. " तृ०१०२. " द्वि०८५शनिबुध
७९. " तृ०९०. " द्वि०१०३. " तृ०८३शुक्रबुध
८०. " च०८९. धनि० प्र०१०४. " च०८६चन्द्रबृहस्पति
८१. उ. षा. प्र०८८. श्रव० च०१०५. रेव० प्र०१००मंगलबृहस्पति
८२. " द्वि०८७. " तृ०१०६. " द्वि०८५शनिबुध
८३. " तृ०८६. " द्वि०१०७. " तृ०८३शुक्रबुध
८४. " च०८५. श्रव० प्र०१०८. " च०८६चन्द्रबृहस्पति

५०२ फलदीपिका कालचक्रदशाक्रम (सारिणी ख) अश्विनी आदि २७ नक्षत्र हैं। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं। भिन्न-भिन्न चरण में उत्पन्न होने से दशाक्रम भिन्न-भिन्न होता है। किस नक्षत्र चरण में जन्म होने से दशाक्रम क्या होता है, यह नीचे दिया जा रहा है :— १. अश्विनी प्र. च. (०-०-० से ०-३-२०) मे. वृष. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृ. ध. २. द्वि. च. (०-३-२० से ०-६-४०) म० कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ३. तृ. च. (०-६-४० से ०-१०-०) वृष मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृष मि० ४. च. च. (०-१०-० से ०-१३-२०) कर्क, सिं., कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ५. भरणी प्र. च. (०-१३-२० से ०-१६-४०) वृश्चि. तु. कन्या कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ६. द्वि. च. (०-१६-४० से ०-२०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क स. कन्या ७. तृ. च. (०-२०-० से ०-२३-४०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या ८. च. च. (०-२३-२० से ०-२६-४०) कर्क, सिंह. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. ७ वर्ष कर्क २१ वर्ष० | तु० १६ व० | म० ४ व० वृ १६ ,, सि ५ ,, | वृ० ७ ,, | कुं. ४ ,, मि. ९ ,, कन्या ९ ,, | ध. १० ,, | मी. १० ,,

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०३ ९. कृत्तिका प्र. च. (०-२६-४० से १-०-०) मे. वृ. मि. कक, सिं. कन्या. तु. वृ. ध. १०. द्वि. च. (१-०-० से १-३-२०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ११. तृ. च. (१-३-२० से से १-६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. १२. च. च. (१-६-४० से १-१०-०) कर्क, सिं. कन्या. तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. १३. रोहिणी प्र. च. (१-१०-० से १-१३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क १४. द्वि. च. (१-१३-२० से १-१६-४०) कन्या तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. १५. तृ. च. (१-१६-४० से १-२०-०) कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ध. म. कुं. १६. च. च. (१-२०-० से १-२३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. १७. मृगशिर प्र. च. (१-२३-२० से १-२६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या. सिं. कर्क १८. द्वि. च. (१-२६-४० से २-०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. १९. तृ. च. (२-०-० से २-३-२०) मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृ. मी. कुं. म. २०. च. च. (२-३-२० से २-६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या. सिं. कर्क, मि. वृ. मे.

५०४ फलदीपिका २१. आर्द्रा प्र. च. (२-६-४० से २-१०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. क. २२. द्वि. च. (२-१०-० से २-१३-२०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. २३. तृ. च. (२-१३-२० से २-१६-४०) मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. २४. च. च. (२-१६-४० से २-२०-०) ध. वृश्चि. तु. कन्या. सिं. कर्क, मि. वृ. मे. २५. पुनर्वसु प्र. च. (२-२०-० से २-२३-२०) मे. वृ. मि. कर्क. सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. २६. द्वि. च. (२-२३-२० से २-२६-४०) म. कु. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. २७. तृ. च. (२-२६-४० से ३-०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. २८. च. च. (३-०-० से ३-३-२०) कर्क, सिं. कन्या, तु, वृश्चि. ध. म. कुं. मी. २९. पुष्य प्र. च. (३-३-२० से ३-६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ३०. द्वि. च. (३-६-४० से ३-१०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या ३१. तृ. च. (३-१०-० से ३-१३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृ. तु. कन्या. ३२. च. च. (३-१३-२० से ३-१६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध.

बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५०५ ३३. आश्लेषा प्र. च. (३-१६-४० से ३-२०-०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तृ. वृश्चि. ध. ३४. द्वि. च. (३-२०-० से ३-२३-२०) मं. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ३५. तृ. च. (३-२३-२० से ३-२६-४०) वृष. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ३६. च. च. (३-२६-४० से ४-०-०) कर्क, सिं. कन्या तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ३७. मघा प्र. च. (४-०-० से ४-३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क ३८. द्वि. च. (४-३-२० से ४-६-४०) कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. ३९. तृ. च. (४-६-४० से ४-१०-०) कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ध. म. कुं. ४०. च. च. (४-१०-० से ४-१३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. ४१. पूर्वाफाल्गुनी प्र. च. (४-१३-२० से ४-१६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क. ४२. द्वि. च. (४-१६-४० से ४-२०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ४३. तृ. च. (४-२०-० से ४-२३-२०) मि. सिं. कर्क. कन्या, तु. वृ. मी. कुं. म. ४४. च. च. (४-२३-२० से ४-२६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क, मि. वृ. मे.

५०६ फलदीपिका ४५. उत्तरा फाल्गुनी प्र. च. (४-२६-४० से ५-०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिंह, कर्क ४६ द्वि. च. (५-०-० से ५-३-२०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ४७. तृ. च. (५-३-२० से ५-६-४०) मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ४८. च. च. (५-६-४० से ५-१०-०) ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ४९. हस्त प्र. च. (५-१०-० से ५-१३-२०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. ५०. द्वि. च. (५-१३-२० से ५-१६-४०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ५१. तृ. च. (५-१६-४० से ५-२०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ५२. च. च. (५-२०-० से ५-२३-२०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. मं. कुं. मी. ५३. चित्रा प्र. च. (५-२३-२० से ५-२६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ५४. द्वि. च. (५-२६-४० से ६-०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिंह, कन्या ५५. तृ. च. (६-०-० से ६-३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या ५६. च. च. (६-३-२० से ६-६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध.

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०७ ५७. स्वाती प्र. च. (६-६-४० से ६-१०-०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. ५८. द्वि. च. (६-१०-० से ६-१३-२०) मं. कुं. मी. वृश्चि. तृ. कन्या, कर्क, सिं. मि. ५९. तृ. च. (६-१३-२० से ६-१६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ६०. च. च. (६-१६-४० से ६-२०-०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ६१. विशाखा प्र. च. (६-२० से ६-२३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क ६२ द्वि. च. (६-२३-२० से ६-२६-४०) कन्या. तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चिव. तु. ६३. तृ. च. (६-२६-४० से ७-०-०) कन्या, सिं. कर्क मि. वृ. मे. ध. म. कुं. ६४. च. च. (७-०-० से ७-३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. ६५. अनुराधा प्र. च. (७-३-२० से ७-६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क ६६. द्वि. च. (७-६-४० से ७-१०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ६७. तृ. च. (७-१०-० से ७-१३-२०) मि. सिं. कर्क कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ६८. च. च. (७-१३-२० से ७-१६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क मि. वृ. मे. ६९. ज्येष्ठा प्र. च. (७-१६-४० से ७-२०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क

५०८ फलदीपिका ७०. द्वि. च. (७-२०-० से ७-२३-२०) मि. वृ. मे. घ. म. कुं. मी. मे. वृ. ७१. तृ. च. (७-२३-२० से ७-२६-४०) मि. सि. कर्क कन्या तु. वृश्चि. मी. कु. म. ७२. च. च. (७-२६-४० से ८-०-०) घ. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क मि. वृ. मे. ७३. मूल प्र. च. (८-०० से ८-३-२०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. ७४. द्वि. च. (८-३-२० से ८-६-४०) भ. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ७५. तृ. च. (८-६-४० से ८-१०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ७६. च. च. (८-१०-० से ८-१३-२०) कर्क सिं. कन्या, तु. वृ. ध. म. कुं. मी. ७७. पूर्वाषाढ प्र. च. (८-१३-२० से ८-१६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ७८. द्वि. च. (८-१६-४० से ८-२०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या. ७९. तृ. च. (८-२०-० से ८-२३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या ८०. च. च. (८-२३-२० से ८-२६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध. ८१. उत्तराषाढ प्र. च. (८-२६-४० से ९-०-०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु.० वृश्चि. ध.

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०९ ८२. द्वि. च. (९-०-० से ९-३-२०) मं. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या कर्क सिं. मि. ८३. तृ. च. (९-३-२० से ९-६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ८४. च. च. (९-६-४० से ९-१०-०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ८५. श्रवण प्र. च. (९-१०-० से ९-१३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क ८६. द्वि. च. (९-१३-२० से ९-१६-४०) कन्या तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. ८७. तृ. च. (९-१६-४० से ९-२०-०) कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ध. म. कुं. ८८. च. च. (९-२०-० से ९-२३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. ८९. धनिष्ठा प्र. च. (९-२३-२० से ९-२६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क ९०. द्वि. च. (९-२६-४० से १०-०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ९१. तृ. च. (१०-०-० से १०-३-२०) मि. म. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ९२. च. च. (१०-३-२० से १०-६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क मि. वृ. मे. ९३. शतभिषा प्र. च. (१०-६-४० से १०-१०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क

५१० फलदीपिका ९४. द्वि. च. (१०-१०-० से १०-१३-२०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ९५. तृ. च. (१०-१३-२० से १०-१६-४०) मि. सिं. कर्क, कन्या तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ९६. च. च. (१०-१६-४० से १०-२०-०) ध. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क मि. वृ. मे. ९७. पूर्वाभाद्र प्र. च. (१०-२०-० से १०-२३-२०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या. तु. वृश्चि. ध. ९८. द्वि. च. (१०-२३-२० से १०-२६-४०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क सिं. मि. ९९. तृ. च. (१०-२६-४० से ११-०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. १००. च. च. (११-०-० से ११-३-२०) कर्क, सिं, कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. १०१. उत्तराभाद्र प्र. च. (११-३-२० से ११-६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. १०२. द्वि. च. (११-६-४० से ११-१०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या। . १०३. तृ. च. (११-१०-० से ११-१३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या १०४. च. च. (११-१३-२० से ११-१६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध. १०५. रेवती प्र. च. (११-१६-४० से ११-२०-०) मे. वृ. मि. कर्क. सिं. कन्या. तु. वृश्चि. ध.

बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५११ १०६. द्वि. च. (११-२०-० से ११-२३-२०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. १०७. तृ. च. (११-२३-२० से ११-२६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. १०८. च. च. (११-२६-४० से १२-०-०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. किस नक्षत्र चरण में जन्म होने से कितने वर्ष की महादशा होती है यह ४९९-५०१ पृष्ठों पर बताया गया है। बिना उसके भी ऊपर के विवरण से पाठक जान सकते हैं कि किस नक्षत्र चरण में जन्म होने से कितने वर्ष की दशा हुई। उदाहरण के लिये किसी मनुष्य का जन्म रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ तो दशा मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु ७ + १६ + ९ + २१ + ५ + ९ + १६ + ७ + १० = १०० वर्ष की हुई। पहिले बताया जा चुका है कि मेष के ७ वर्ष, वृष के १६ वर्ष.... इत्यादि होते हैं। इसी कारण जिस राशि की दशा के जितने वर्ष बताये गये हैं वे राशियों के नीचे लिख कर जोड़ा तो कुल १०० वर्ष हुए। अब मान लीजिये जन्म के दिन (पहिला दिन या दूसरा दिन भी शामिल करके) रेवती का कुल नक्षत्र मान ५६ घड़ी है। तो रेवती का एक चरण (चौथाई) १४ घड़ी का हुआ इसमें से ७ घड़ी बीत चुका है ७ घड़ी बाकी है। तो भुक्त भोग्य कितनी दशा हुई ? इसमें दो मत हैं। (१) एक मत तो यह है कि रेवती नक्षत्र प्रथम चरण में सबसे पहिले मेष की दशा आती है। मेष की दशा—कुल ७ वर्ष हैं। प्रथम चरण का आधा व्यतीत हो चुका है इस कारण ३½ वर्ष बीत गये बाकी ३½ वर्ष मेष के भोग्य, उसके बाद १६ वर्ष वृष के योग्य, फिर मिथुन के ९ वर्ष

५१२ फलदीपिका इत्यादि। इस मत को हम उतना मान्य नहीं मानते। क्योंकि जब एक चरण की महादशा १०० वर्ष की है तो आधा चरण बीत जाने से केवल ३ १/२ वर्ष भुक्त हुए बाकी ९६ १/२ वर्ष भोग्य हुए यह असंगत प्रतीत होता है। परन्तु फिर भी बहुत-से लोग इस मत को भी मानते हैं। (२) दूसरा मत जो हमारे विचार से अधिक मान्य है वह यह है कि एक चरण के १०० वर्ष हुए : आधा चरण बीत गया है। इस कारण १०० का आधा पचास वर्ष बीत गये। बाकी पचास वर्ष रहे। अब गिनिये, मेष के ७ वर्ष, वृषभ के १६ वर्ष, मिथुन के ९ वर्ष, और कर्क के २१ कुल ७+१६+९+२१=५३ वर्ष हुए। ५० बीत गये— इस कारण ७+१६+९+१८=५० वर्षों में से १८ वर्ष कर्क के बीते हैं। ३ वर्ष कर्क के बाकी हैं। इसलिये भोग्य दशा—जो जातक को भोगनी पड़ेगी वह होगी। कर्क भोग्य सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु ३ + ५ + ९ + १६ + ७ + १० = ५० वर्ष जब जातक ५० वर्ष का हो जावेगा तब कौन-सी दशा चलेगी ? देखिये रेवती प्रथम चरण के बाद रेवती द्वितीय चरण होता है। इस कारण ५० वर्ष के बाद रेवती के द्वितीय चरण की जो दशा बतायी गयी है—अर्थात् मकर के ४ वर्ष, उसके बाद कुंभ के ४ वर्ष, तब मीन के १० वर्ष, वृश्चिक के ७ वर्ष, यह दशायें आवेंगी। यदि रेवती के अन्तिम (चतुर्थ चरण) में जन्म होवे और उसमें भोग्य —मान लीजिये केवल ४० वर्ष हो, तो उसके बाद अश्विनी के प्रथम चरण में जो दशा दी गई है वे आवेंगी। पुस्तक के अन्त में चन्द्र स्पष्ट से भुक्त, भोग्य महादशा निकालने की सारणियां नं. १,२,३,४ दी जा रही हैं।

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५१३ सारिणी नं. ५ कलाओं का दशामान चन्द्र पूर्ण आयु ८५ वर्ष ८३ वर्ष ८६ वर्ष कला १०० वर्ष वर्ष-मास-दिन व. मा. दि. व. मा. दि. व. मा. दि. १ ०-६-० ०- ५- ३ ०- ४-२९ ०- ५- ५ २ १-०-० ०-१०- ६ ०- ९-२९ ०-१०-१० ३ १-६-० १- ३- ९ १- २-२८ १- ३-१४ ४ २-०-० १- ८-१२ १- ७-२८ १- ८-१९ ५ २-६-० २- १-१५ २- ०-२७ २- १-२४ ६ ३-०-० २- ६-१८ २- ५-२६ २- ६-२९ ७ ३-६-० २-११-२१ २-१०-२६ ३- ०- ४ ८ ४-०-० ३- ४-२४ ३- ३-२५ ३- ५- ८ ९ ४-६-० ३- ९-२७ ३- ८-२५ ३-१०-१३ १० ५-०-० ४- ३- ० ४- १-२४ ४- ३-१८ ११ ५-६-० ४- ८- ३ ४- ६-२३ ४- ८-२३ १२ ६-०-० ५- १- ६ ४-११-२३ ५- १-२८ १३ ६-६-० ५- ६- ९ ५- ४-२२ ५- ७- २ १४ ७-०-० ५-११-१२ ५- ९-२२ ६- ०- ७ १५ ७-६-० ६- ४-१५ ६- २-२१ ६- ५-१२ १६ ८-०-० ६- ९-१८ ६- ७-२० ६-१०-१७ १७ ८-६-० ७- २-२१ ७- ०-२० ७- ३-२२ १८ ९-०-० ७- ७-२४ ७- ५-१९ ७- ८-२६ १९ ९-६-० ८- ०-२७ ७-१०-१९ ८- २- १ २० १०-०-० ८- ६- ० ८- ३-१८ ८- ७- ६

५१४ फलदीपिका चन्द्र १०० वर्ष ८५ वर्ष ८३ वर्ष ८६ वर्ष कला .२१ १०- ६- ० ८-११- ३ ८- ८-१७ ९- ०-११ २२ ११- ०- ० ९- ४- ६ ९- १-१७ ९- ५-१६ २३ ११- ६- ० ९- ९- ९ ९- ६-१६ ९-१०-२० २४ १२- ०- ० १०- २-१२ ९-११-१६ १०- ३-२५ २५ १२- ६- ० १०- ७-१५ १०- ४-१५ १०- ९- ० नोट :—जहाँ आधे से अधिक दिन अर्थात् ३० घड़ी से अधिक आया है उसको १ दिन मान लिया गया है और जहाँ आधे दिन से कम अर्थात् ३० घड़ी से कम समय आया है--उन दिनों को छोड़ दिया गया है। उदाहरण : मान लीजिये किसी का स्पष्ट चन्द्र ११-२०-३९ है। अर्थात् जन्म के समय चन्द्रमा मीन राशि के २० अंश ३९ कला पर था। यह रेवती नक्षत्र के द्वितीय चरण में हुआ । देखिये सारिणी 'क' । रेवती द्वितीय चरण की परमायु ८५ वर्ष है । ८५ वर्ष वाली सारिणी न० २ में देखिये । यह सारिणी पुस्तक के अन्त में दी गई है। व. मा. दि ११-२०-२५ की भोग्य दशा ७४-४-१५ है ११-२०-५० की भोग्य दशा ६३-९- ० हमें ११-२०-३९ की भोग्य दशा निकालनी है। अब चाहे ११-२०-२५ में से (३९-२५ = १४) चौदह कला का मान निकाल दीजिये, चाहे ११-२०-५० में (५०-३९ = ११) ग्यारह कला का मान जोड़िये—भोग्य दशा निकल आवेगी ।

बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५१५ व. मा. दि. ११-२०-२५ = ७४-४-१५ घटाइये ०- ०-१४ कला का मान = ५-११-१२ (यह ८५ के नीचे १४ के आगे सारिणी नं० ५ में देखिये) पृ० ५१३। भोग्यदशा ६८-५-३ दूसरा प्रकार व. मा. दिन १०-२०-५० = ६३-९-० (सारिणी नं० २) जोड़िये ११ कला का मान ४-८-३ (सारिणी नं० ५ में ८५ के नीचे ११ के सामने पृ० ५१३) ―――――― ६८-५-३ इस प्रकार से भी वही भोग्य आ गया। अब देखिये सारिणी 'ख'। रेवती द्वितीय नक्षत्र का मान ८५ वर्ष है। इसमें ९ दशा होती हैं। मकर शनि + कुंभ शनि + मीन बृहस्पति + वृश्चिक मंगल + तुला शुक्र ४ + ४ + १० + ७ + १६

  • कन्या बुध + कर्क चन्द्र + सिंह रवि + मिथुन बुध
  • ९ + २१ + ५ + ९ = ८५ वर्ष भोग्य ६८ वर्ष--५ मास ३ दिन है। इसको ८५ में से घटाया। ८५-०-० ६८-५-३ ―――――― १६-६-२७ अर्थात् १६ वर्ष ६ मास २७ दिन भुक्त हुए, यानी जब जातक पैदा हुआ तब बीत चुके थे।