भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 684 में से

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४९८ फलदीपिका। दशा के गणित को सारिणियों द्वारा समझाया जाता है। १. किस नक्षत्र चरण की कितनी परमायु होती है यह आगे के पृष्ठ पर सारिणी 'क' में देखिये । २. प्रत्येक नक्षत्र चरण (आजकल नवीन गणितज्ञ रैफिल या लहरी के पंचांगों को विशेष काम में लाते हैं) जिनमें स्पष्ट चन्द्र लाघवार्थ (लोगेरिथम) से करने की पद्धति दी रहती है। इस कारण नक्षत्र चरणों के साथ-साथ सारिणी 'ख' में स्पष्ट चन्द्र भी ब्रैकेट के अन्दर दे दिये गये हैं। सारिणी 'ख' में यह बताया गया है कि किस नक्षत्र चरण में किन-किन राशियों की दशा होती है । (३) सारिणी 'क' में नक्षत्र (कोष्ठ क, ग, ङ, छ, झ में) ऊपर से नीचे प्र० च०, द्वि० च०, तृ० च०, च० च० इस क्रम से दिये गये हैं। उनकी राशियों की महादशा (सारिणी 'ख') में जो राशि सर्वप्रथम हो वह 'देह' और जो राशि सबके अन्त में आवे वह 'जीव' कहलाती है। 'देह' राशि का स्वामी 'देहाधिप' और 'जीव' राशि का स्वामी 'जीवाधिप' कहलाता है । ४. सारिणी 'क' में जो नक्षत्र (कोष्ठ ख, घ, च, ज) में नीचे से ऊपर (च० च०, तृ० च०, द्वि० च०, प्र० च०) इस क्रम से दिये गये हैं उनकी राशियों की महादशा (सारिणी 'ख' में) जो राशि सर्वप्रथम हो वह 'जीव' और उस राशि का स्वामी 'जीवाधिप' और जो राशि सबसे अन्त में हो, वह 'देह' और उसका स्वामी 'देहाधिप' कहलाता है। इन 'जीव' और 'देह' राशियों की आगे फलित में आवश्यकता पड़ेगी इसलिये ध्यान में रखना चाहिये । *स्पष्ट चन्द्र से भुक्त, भोग्य, महादशा निकालने की सारिणियां पुस्तक के अन्त में दी गई हैं।