फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६३ रहे। चोर लोग धन चुरा कर ले जायें, बाँये नेत्र में कष्ट हो। नौकरों की हानि हो। अर्थात् जातक को नौकरों को कष्ट हो या नौकरों की संख्या में कमी हो जाये ॥२७॥ (viii) मंगल की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : राजा से सम्मान प्राप्त हो। युद्ध के कारण जातक के प्रभाव में वृद्धि; जातक के नौकरों में, धन में, धान्य में लक्ष्मी में और उसकी स्त्रियों में वृद्धि और विलास हो। अर्थात् इन सब वस्तुओं का अधिकाधिक वैभव और विलास हो। जातक अपने साहस से लक्ष्मी का उपार्जन करे ॥२८॥ (ix) मंगल की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : नाना प्रकार के धनों का आगम हो। पुत्र-प्राप्ति हो, वस्त्र, शय्या, आभूषण, रत्न और सम्पत्ति मिले। शत्रुओं से जुदाई हो अर्थात् शत्रु पीड़ा न रहे। लेकिन किसी गुरुजन को पीड़ा हो और जातक को स्वयं को भी गुल्म और पित्त के कारण कष्ट हो सकता है ॥२९॥ राहु की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल विषाम्बुरुग्दुष्टभुजङ्गदर्शनं पराबलासंयुतिरिष्टविच्युतिः । अरिष्टवाग्दुष्टजनव्यथा भवेद्विधुंतुदेनापहृते स्ववत्सरे ॥३०॥ सुखोपनीतिः सुरविप्रपूजनं विरोगता वामदृशां समागमः । सुपुण्यशास्त्रार्थविचारसम्भवः सुरारिदायान्तरगे बृहस्पतौ ॥३१॥